
कल्पना कीजिए, अगर कोई लाइब्रेरी किताबों की बजाय लोगों को “उधार” दे – जिनसे आप बातें कर सकें, उनकी कहानियाँ सुन सकें, और ज़िंदगी को नए नजरिए से समझ सकें। यह अब सिर्फ एक कल्पना नहीं, बल्कि IIT पलक्कड़ में एक वास्तविक पहल बन चुकी है। संस्थान एक अनोखा “मानव पुस्तकालय” (Human Library) शुरू कर रहा है, जहां किताबों की जगह इंसान होंगे – वे लोग, जिन्होंने समाज की रूढ़ियों, भेदभाव और संघर्षों को पार कर अपनी कहानियाँ खुद गढ़ी हैं।
क्या है मानव पुस्तकालय?
मानव पुस्तकालय आंदोलन की शुरुआत डेनमार्क से हुई थी, और अब भारत में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है। इस पहल में “मानव पुस्तकें” वे लोग होंगे, जो जाति, लिंग, वर्ग, रंग, विकलांगता, पेशा या सामाजिक कलंक जैसी बाधाओं से जूझकर सामने आए हैं और अब वे अपनी ज़िंदगी की असली कहानियाँ साझा करना चाहते हैं।
IIT पलक्कड़ के मानविकी और सामाजिक विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुदर्शन आर. कोट्टायी ने बताया, “हम ऐसे लोगों की तलाश कर रहे हैं जो अपने अनुभव साझा कर सकें और संवाद के ज़रिए रूढ़ियों को तोड़ने में योगदान दे सकें। यह मंच उन आवाज़ों को सामने लाएगा जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है।”
कैसे चलेगा यह कार्यक्रम?
यह एक दिवसीय कार्यक्रम मानविकी विभाग और शिक्षा मंत्रालय की ‘उन्नत भारत अभियान’ (UBA) के सहयोग से आयोजित किया जाएगा। आयोजन में “मानव पुस्तकें” अपने अनुभव साझा करेंगी और “पाठक” उनसे आमने-सामने बात कर सकेंगे।
प्रभुल्लादास आर, IIT पलक्कड़ में UBA समन्वयक ने कहा, “यह पहल उन लोगों के लिए मंच है जिन्हें समाज ने चुप रहने पर मजबूर किया। अब वे खुद एक किताब बनकर बोलेंगे।”
पहचान हो रही है ‘पुस्तकों’ की
अब तक 7 संभावित “मानव पुस्तकों” की पहचान की जा चुकी है – जिनमें एक ट्रांसजेंडर डॉक्टर, एक पूर्ण ऐल्बिनिज़्म से पीड़ित व्यक्ति और एक विकलांग व्यक्ति शामिल हैं। हालांकि, कार्यक्रम के लिए कम से कम 12 “किताबों” की आवश्यकता है।
इन व्यक्तियों को आयोजन से पहले एक ओरिएंटेशन दिया जाएगा, जिसमें उन्हें यह सिखाया जाएगा कि कार्यक्रम के दौरान वे खुद को कैसे प्रस्तुत करें।
स्वैच्छिक भागीदारी, संवाद की स्वतंत्रता
डॉ. कोट्टायी ने बताया कि यह पूरी तरह स्वैच्छिक कार्यक्रम है। मानव पुस्तकें किसी भी तरह के सवालों का जवाब देने के लिए स्वतंत्र होंगी – और अगर कोई सवाल उन्हें असहज करता है, तो वे जवाब देने से इनकार कर सकती हैं।
“वो जवाब दे सकते हैं – ‘यह अध्याय अभी लिखा नहीं गया।’
यह मंच किसी को और आहत करने के लिए नहीं, बल्कि समझ और संवेदना बढ़ाने के लिए है।”
आवेदन प्रक्रिया शुरू
भारत के किसी भी हिस्से से इच्छुक व्यक्ति “मानव पुस्तक” बनने के लिए आवेदन कर सकते हैं। हालांकि, डेनमार्क स्थित संगठन के दिशा-निर्देशों के अनुसार, यह पूरी तरह से स्वैच्छिक रहेगा – किसी को इसके लिए आर्थिक सहायता नहीं दी जाएगी।
अगर यह सफल रहा तो आगे भी होगा आयोजन
डॉ. कोट्टायी ने बताया कि उन्होंने डेनमार्क स्थित संगठन से प्रकाशन साझेदारी की है और IIT पलक्कड़ मेज़बान संस्थान के रूप में अगले साल जनवरी या फरवरी में इस कार्यक्रम की मेजबानी करेगा।
यदि यह आयोजन सफल रहा, तो यह साझेदारी नवीनीकृत की जा सकती है और भविष्य में पुस्तकालयों, टाउन हॉल्स या सार्वजनिक स्थलों पर भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जा सकेंगे।
यह सिर्फ कार्यक्रम नहीं, एक बदलाव की शुरुआत है
IIT पलक्कड़ की यह पहल उस दिशा में एक बड़ा कदम है जहां किताबों से ज़्यादा जरूरी हो जाती हैं ज़िंदगी की असल कहानियां – जो हमें समझना सिखाएं, जोड़ना सिखाएं और समाज को थोड़ा और इंसानी बना सकें।
अगर आप भी एक “मानव पुस्तक” बनने के इच्छुक हैं, तो यह मौका आपके लिए है – अपनी आवाज़, अपनी कहानी और अपनी पहचान को सामने लाने का।




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