
बॉम्बे हाईकोर्ट में हाल ही में नियुक्त किए गए नए जजों में पूर्व भाजपा प्रवक्ता आरती साठे का नाम भी शामिल है। आरती साठे दो वर्ष पहले तक महाराष्ट्र भाजपा की प्रवक्ता रह चुकी हैं। उनकी न्यायिक नियुक्ति को लेकर विपक्षी दलों ने न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।
एनसीपी (शरद पवार गुट) के विधायक रोहित पवार ने इस नियुक्ति को न्यायिक निष्पक्षता के लिए खतरा बताया और न्यायमूर्ति आरती साठे को हटाने की मांग की है। वहीं, कांग्रेस विधायक दल के नेता विजय वडेट्टीवार ने सवाल उठाया कि, “क्या भाजपा के प्रवक्ता रहे व्यक्ति को जज बनाया जाना न्याय के हित में है? क्या ऐसे व्यक्ति से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद की जा सकती है?”
भाजपा का बचाव: नियुक्ति कॉलेजियम के जरिए, अब कोई राजनीतिक संबंध नहीं
इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता केशव उपाध्याय ने कहा कि आरती साठे की नियुक्ति कॉलेजियम की सिफारिश पर की गई है, न कि किसी राजनीतिक हस्तक्षेप से। उन्होंने बताया कि आरती साठे ने करीब डेढ़ साल पहले भाजपा से इस्तीफा दे दिया था, और फिलहाल उनका पार्टी से कोई संबंध नहीं है।
उपाध्याय ने संदर्भ में 1972 की मिसाल देते हुए कहा कि उस समय कांग्रेस नेता बहरुल इस्लाम को गुवाहाटी हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। उन्होंने कहा कि जजों की नियुक्ति के लिए राजनीतिक पृष्ठभूमि के आधार पर निर्णय नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि व्यवसायिक योग्यता और कॉलेजियम की प्रक्रिया पर भरोसा किया जाना चाहिए।
आरती साठे की न्यायिक नियुक्ति ने राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर विपक्ष इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल के रूप में देख रहा है, वहीं भाजपा इसे एक संवैधानिक और प्रक्रियागत नियुक्ति बता रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।




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