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अमेरिका की सख्त वीजा नीतियों से अंतरराष्ट्रीय छात्र मायूस, ब्रिटेन और एशिया बन रहे नई पसंद

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन की कड़ी वीजा नीतियों और सुरक्षा जांच की सख्ती ने अमेरिका को पढ़ाई के लिए चुनने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों के सामने कई नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। खासकर चीन के छात्र वीजा इंटरव्यू में भारी देरी और अनिश्चितता के कारण अमेरिका का विकल्प छोड़कर दूसरे देशों का रुख कर रहे हैं।

चीन में वीजा इंटरव्यू की लंबी प्रतीक्षा, छात्रों का धैर्य जवाब दे रहा
लंदन से मिली रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन में अमेरिका के छात्र वीजा के लिए इंटरव्यू का इंतजार इतना लंबा हो गया है कि कई छात्रों ने अमेरिका में पढ़ाई की योजना ही छोड़ दी है। वहीं, हांगकांग की यूनिवर्सिटियाँ अब ऐसे छात्रों के ट्रांसफर अनुरोधों से जूझ रही हैं जो अमेरिका छोड़कर वहां आना चाहते हैं।

अमेरिका में वीजा प्रक्रिया सख्त, छात्रों के लिए बना सिरदर्द
ट्रंप सरकार ने अमेरिकी कॉलेजों पर विदेशी छात्रों की संख्या सीमित करने का दबाव बढ़ाया है। कई छात्रों को राजनीतिक गतिविधियों के कारण अमेरिका छोड़ने के लिए मजबूर किया गया, जबकि कुछ के वैध वीजा अचानक रद्द कर दिए गए। सोशल मीडिया जांच, वीजा अपॉइंटमेंट में देरी और अस्थायी स्थगन जैसी नीतियों ने छात्रों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

बदले विकल्प, अमेरिका को भारी आर्थिक नुकसान की आशंका
अमेरिका की जगह अब छात्र ब्रिटेन, हांगकांग, सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों में पढ़ाई के लिए आवेदन कर रहे हैं। उच्च शिक्षा पर नजर रखने वाली संस्था NAFSA के मुताबिक, अमेरिका में इस साल अंतरराष्ट्रीय छात्रों के नामांकन में 30–40% तक की गिरावट आ सकती है। इसका असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर करीब 7 अरब डॉलर के नुकसान के रूप में हो सकता है।

ब्रिटेन बना नई पसंद, छात्रों के लिए खुला माहौल
ब्रिटेन अब अमेरिका के बाद दूसरा सबसे लोकप्रिय देश बन गया है। भले ही नई लेबर सरकार ने आव्रजन पर नियंत्रण की बात कही हो, लेकिन फिर भी वहां का वातावरण छात्रों के लिए कहीं अधिक स्वागतपूर्ण है। चीनी छात्रों की संख्या में 10% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और अमेरिकी छात्रों का नामांकन भी दो दशक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है।

एशियाई विश्वविद्यालयों की मांग में उछाल
चीन, सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों के विश्वविद्यालय अब तेजी से अंतरराष्ट्रीय छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं। कोविड-19 के बाद एशिया में उच्च शिक्षा को लेकर रुझान पहले से ही बढ़ रहा था, जिसे अमेरिका की नीतियों ने और तेज कर दिया है।

सैटेलाइट कैंपस बना नया आकर्षण
संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने भी विदेशी विश्वविद्यालयों के ब्रांच कैंपस खोलकर छात्रों को आकर्षित किया है। दुबई में पिछले साल अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में 33% की वृद्धि हुई है। इसी राह पर कजाकिस्तान भी चल रहा है, जहां कई अमेरिकी यूनिवर्सिटियाँ अपनी शाखाएं खोल चुकी हैं।

जहां एक ओर अमेरिका की सख्त नीतियाँ उसे अंतरराष्ट्रीय शिक्षा बाजार में पीछे धकेल रही हैं, वहीं ब्रिटेन और एशियाई देशों ने अवसरों का लाभ उठाते हुए छात्रों को बेहतर विकल्प देना शुरू कर दिया है। अगर अमेरिका ने अपनी नीति नहीं बदली, तो यह बदलाव स्थायी भी हो सकता है।

Asmita Sarkar

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