
शोध पत्रों की वापसी (retraction) के मामले में भारत का अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में तीसरे स्थान पर आना चिंता का विषय है। यह स्थिति हताशा नहीं, बल्कि आत्ममंथन की मांग करती है। जितनी चिंता इस बढ़ती संख्या को लेकर होनी चाहिए, उतनी ही संस्थागत सुस्ती को लेकर भी होनी चाहिए, जिसने वर्षों तक शैक्षणिक अनियमितताओं को अनदेखा किया।
मात्रा बनाम गुणवत्ता: रैंकिंग प्रणाली में बदलाव की ज़रूरत
अब तक, नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (NIRF) ने गुणवत्ता की बजाय मात्रा को प्राथमिकता दी है, जिसके चलते संस्थानों ने शोध पत्रों की संख्या को तरजीह दी, शैक्षणिक ईमानदारी को नहीं। हालांकि, यह नीति अब बदल रही है।
2025 से NIRF, वापिस लिए गए शोध पत्रों के आधार पर संस्थानों को दंडित करेगा। यह एक सकारात्मक लेकिन देर से लिया गया फैसला है।
JNU विवाद और प्रोफेसर बनाम शोधार्थी की लड़ाई
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) फिर सुर्खियों में है, जहां सेवानिवृत्त प्रोफेसर राजीव कुमार ने अपने पूर्व पीएचडी छात्र ओम प्रकाश पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उनकी अनुमति के बिना उनका शोध चुरा कर IEEE जर्नल में प्रकाशित कर दिया।
यह शोध पत्र — “Detection of Fake Accounts on Social Media Using Multimodal Data With Deep Learning” — 7 अगस्त 2023 को सात सह-लेखकों के साथ प्रकाशित हुआ, जिनमें से सभी अन्य संस्थानों से हैं।
प्रश्न उठता है: सम्मानित संस्थानों के प्रोफेसर अनैतिक क्यों हो रहे हैं? क्या वे इसके लिए मजबूर हैं?
IIT रुड़की का उदाहरण: प्रणालीगत विफलता का प्रतीक
IIT रुड़की के प्रोफेसर ज़िल्लुर रहमान का मामला इस व्यापक समस्या का प्रतीक है। 2004 से 2020 के बीच उनके 5 शोध पत्रों को प्लेगियारिज़्म, डुप्लीकेशन और संदिग्ध डेटा के चलते वापिस लिया गया, फिर भी वह मई 2025 तक डीन के पद पर बने रहे।
जब India Research Watchdog के अचल अग्रवाल ने इस मामले को उठाया, तब संस्थान ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी — न प्रोफेसर ने, न संस्थान ने।
आंकड़े: समस्या कितनी गहरी है?
सांख्यिकी वेबसाइट Post-Pub के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में प्रत्येक 1,000 शोध पत्रों पर वापसी की दर 2012 में 1.5 से बढ़कर 2022 में 3.5 हो गई।
इसका एक कारण शोधार्थियों और युवा शिक्षकों पर “छापने का दबाव” है। लेकिन असली मुद्दा है — संस्थागत और कानूनी संरक्षण का अभाव।
दुनिया के मुकाबले भारत पीछे क्यों है?
जहां डेनमार्क और ब्रिटेन जैसे देशों में स्वतंत्र एजेंसियां अनुसंधान में गड़बड़ी की जांच करती हैं, वहीं भारत में शिकायतें UGC और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग जैसे निकायों के बीच उलझकर रह जाती हैं — और अक्सर उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
प्राइवेट कॉलेजों की भूमिका और रैंकिंग का दबाव
सरकारी विश्वविद्यालयों की स्थिति भले खराब हो, निजी कॉलेजों में हालात और भी चुनौतीपूर्ण हैं।
NIRF रैंकिंग में ऊपर आने की होड़ में ये संस्थान बिना समुचित फंडिंग दिए शोध पत्रों की मांग करते हैं, जिससे निम्न गुणवत्ता वाले, जल्दबाज़ी में किए गए शोध प्रकाशित होते हैं — अक्सर प्रिडेटरी जर्नल्स में, जिनमें कोई गुणवत्ता जांच नहीं होती।
कुछ सकारात्मक प्रयास — लेकिन काफी नहीं
BITS पिलानी जैसे संस्थान Research Integrity Offices स्थापित कर रहे हैं और एथिक्स ट्रेनिंग में निवेश कर रहे हैं, जिससे शिक्षकों और छात्रों में विश्वास और नैतिकता बढ़े।
हालांकि, ये प्रयास अकेले इस प्रणालीगत भ्रष्टाचार को सुधारने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
HECI से उम्मीदें, लेकिन संदेह भी
आगामी Higher Education Commission of India (HECI) से कुछ उम्मीदें जरूर हैं, लेकिन यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह आयोग बिना राज्यों की भागीदारी के प्रभावी होगा?
शोध में ईमानदारी कोई विकल्प नहीं, अनिवार्यता है
अगर भारत को वैश्विक अनुसंधान केंद्र बनना है, तो शैक्षणिक ईमानदारी को अनिवार्य बनाना होगा। अनैतिकता के मामलों में कड़े, करियर-बदलने वाले दंड तय करने होंगे।
अन्यथा, भारत की शोध में साख धीरे-धीरे खत्म होती जाएगी — निगाहों से छुपकर, लेकिन लगातार।




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