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न्याय व्यवस्था की अहम जरूरत है भारत में फॉरेंसिक लैब्स का विस्तार

भारत में अपराध के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है और इनके निपटारे में वैज्ञानिक साक्ष्यों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। हत्या, दुष्कर्म, साइबर क्राइम, वित्तीय धोखाधड़ी और आतंकी हमलों जैसे मामलों में सही सबूत जुटाना और उनका विश्लेषण करना न्यायिक प्रक्रिया की रीढ़ बन चुका है। लेकिन देश में फॉरेंसिक लैब्स की कमी के कारण न्याय में देरी और अपराधियों के छूटने की घटनाएं आम हो गई हैं।

वर्तमान स्थिति और चुनौतियां
भारत में कुल फॉरेंसिक साइंस लैब्स (FSL) की संख्या जनसंख्या और अपराध दर की तुलना में बेहद कम है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, हर साल लाखों केस दर्ज होते हैं, लेकिन फॉरेंसिक जांच के लिए सीमित लैब्स और प्रशिक्षित विशेषज्ञों के कारण सबूतों की रिपोर्ट आने में महीनों लग जाते हैं। कई मामलों में नमूने समय पर परीक्षण न होने के कारण ख़राब हो जाते हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया कमजोर पड़ती है।

इसके अलावा, मौजूदा लैब्स में आधुनिक तकनीक और पर्याप्त मानव संसाधन का भी अभाव है। डीएनए टेस्ट, फिंगरप्रिंट विश्लेषण, साइबर फॉरेंसिक और विस्फोटक पदार्थों की जांच जैसे क्षेत्रों में अक्सर विशेषज्ञों की भारी कमी देखी जाती है।

भारत में मौजूदा स्थिति
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2024 में देश में 60 लाख से अधिक संज्ञेय अपराध दर्ज किए गए। इसके बावजूद देशभर में कुल मिलाकर करीब 30 राज्य स्तरीय फॉरेंसिक साइंस लैब्स (FSL) और कुछ क्षेत्रीय व मोबाइल लैब्स ही संचालित हो रही हैं।
डीएनए टेस्टिंग में भारी देरी: NCRB की रिपोर्ट के अनुसार, दर्जनों राज्यों में डीएनए नमूनों के विश्लेषण में 6 से 12 महीने लग जाते हैं।
बैकलॉग का संकट: कुछ राज्यों में लंबित फॉरेंसिक केसों का बैकलॉग 20,000 से भी अधिक है।
जनसंख्या-लैब अनुपात: अमेरिका जैसे देशों में हर 10 लाख आबादी पर एक से अधिक फॉरेंसिक सुविधा है, जबकि भारत में यह अनुपात बेहद कम है—लगभग 4-5 करोड़ लोगों पर एक प्रमुख लैब।

अंतरराष्ट्रीय तुलना
अमेरिका: लगभग 400+ सार्वजनिक फॉरेंसिक लैब्स हैं। वहां डीएनए विश्लेषण और डिजिटल फॉरेंसिक के लिए समर्पित केंद्र मौजूद हैं।
यूरोप: फॉरेंसिक लैब्स के लिए यूरोपीय नेटवर्क है जो मानकीकरण, डेटा शेयरिंग और तेज परिणामों पर काम करता है।
भारत: यहां न तो पर्याप्त लैब्स हैं और न ही एकीकृत राष्ट्रीय नेटवर्क जो सभी राज्यों को जोड़ सके। परिणामस्वरूप, मामलों की जांच में महीनों की देरी होती है।

अपराध न्याय प्रणाली में फॉरेंसिक की भूमिका
फॉरेंसिक साक्ष्य अदालत में सबसे मजबूत गवाह होते हैं। केवल चश्मदीद बयानों या पुलिस रिपोर्ट पर निर्भर रहने की बजाय वैज्ञानिक साक्ष्य अपराध को साबित करने में निर्णायक होते हैं। डीएनए प्रोफाइलिंग, डिजिटल डेटा रिकवरी, ड्रग एनालिसिस और हथियारों की जांच जैसे वैज्ञानिक तरीक़े दोषियों को सज़ा दिलाने में मदद करते हैं।

भारत में त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए फॉरेंसिक जांच का समय पर और सटीक होना आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में भारत में फॉरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी काफी पीछे है।

क्या होना चाहिए?
अधिक फॉरेंसिक लैब्स की स्थापना: प्रत्येक जिले या कम से कम प्रत्येक संभाग स्तर पर आधुनिक लैब्स स्थापित की जाएं।
तकनीकी निवेश: अत्याधुनिक उपकरणों और अंतरराष्ट्रीय मानकों की तकनीक में निवेश हो।
विशेषज्ञों का प्रशिक्षण: फॉरेंसिक साइंस में युवाओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम और उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ाए जाएं।
साइबर और डिजिटल फॉरेंसिक पर जोर: बढ़ते साइबर अपराध को देखते हुए डिजिटल साक्ष्यों के विश्लेषण के लिए विशेष यूनिट बनाई जाए।
कानूनी ढांचे में सुधार: अदालतों में फॉरेंसिक रिपोर्ट को प्राथमिकता से स्वीकार करने और जांच प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश हों।

भारत जैसे विशाल देश में अपराध नियंत्रण और न्याय की गति को बढ़ाने के लिए फॉरेंसिक ढांचे को मज़बूत करना अनिवार्य है। अधिक लैब्स, प्रशिक्षित विशेषज्ञ और आधुनिक तकनीक से ही वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित त्वरित न्याय संभव हो सकेगा। अपराधियों को सज़ा और निर्दोष को राहत तभी मिलेगी जब न्याय व्यवस्था सबूतों के वैज्ञानिक आधार पर चले।

Asmita Sarkar

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