
पंजाबी विश्वविद्यालय के छात्रों ने गुरुवार को विश्वविद्यालय अधिकारियों द्वारा भाई काहन सिंह नाभा द्वारा लिखित महान कोष (पंजाबी विश्वकोश) की पुनर्मुद्रित प्रतियों को दफनाने के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया।
छात्रों का आरोप: पंजाबी भाषा और विरासत का अपमान
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर में गड्ढे खोदकर महान कोष की प्रतियाँ फेंकी जा रही थीं। जैसे ही छात्र संगठन के सदस्य वहाँ पहुँचे, उन्होंने इसे रोकने की कोशिश की।
छात्र नेताओं यादविंदर सिंह यादु और कुलदीप सिंह झिंजर ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर पंजाबी भाषा और उसकी विरासत का अपमान करने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि इस तरह पुस्तकों को नष्ट करना “अपवित्रता” है।
विद्वानों की चेतावनी: दोषपूर्ण प्रतियों को नष्ट करो
दरअसल, हाल के वर्षों में विश्वविद्यालय ने महान कोष का पुनर्प्रकाशन किया था, लेकिन विद्वानों और भाषा विशेषज्ञों ने इसमें कई त्रुटियाँ बताई थीं।
6 अगस्त को सिख बुद्धिजीवियों और सांस्कृतिक संगठनों का एक प्रतिनिधिमंडल—जिसमें डॉ. खुशहाल सिंह, राजिंदर सिंह, डॉ. प्यारा लाल गर्ग, परमजीत सिंह और अमरजीत सिंह धवन शामिल थे—ने पंजाब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवान से मुलाकात कर चेतावनी दी थी कि यदि दोषपूर्ण प्रतियों को वापस नहीं मंगाया गया, तो वे सार्वजनिक आंदोलन शुरू करेंगे।
कुलपति का आश्वासन और कार्रवाई
इस बैठक के बाद, पंजाबी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जगदीप सिंह ने आश्वासन दिया था कि 15 दिनों के भीतर गलत प्रतियाँ वापस मंगाकर नष्ट कर दी जाएंगी। इसी आश्वासन के तहत विश्वविद्यालय प्रशासन ने किताबों को दफनाने की प्रक्रिया शुरू की।
भाई काहन सिंह नाभा द्वारा वर्ष 1930 में पहली बार प्रकाशित महान कोष पंजाबी भाषा का पहला विश्वकोश माना जाता है। इसमें लगभग 80,000 शब्दों के अर्थ और व्याख्याएँ शामिल हैं।




Add comment