
महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में भाषा विवादों के बीच, मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने एक अहम पहल की घोषणा की है। अब प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था केवल पारंपरिक विषयों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसमें भारतीय भाषाओं से जुड़े विशेष कोर्स भी शामिल किए जाएंगे। इसका उद्देश्य छात्रों को नई भाषाओं का ज्ञान दिलाना और “विविधता में एकता” का संदेश मजबूत करना है।
राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री इंदरसिंह परमार ने कहा, “मध्य प्रदेश अब भाषाई एकता का केंद्र बनने की दिशा में काम कर रहा है। हमारा मकसद है कि प्रदेश का युवा देश के किसी भी हिस्से में जाकर वहां की भाषा और लोगों से सहज संवाद कर सके।” उन्होंने बताया कि भारत में 12 राष्ट्रीय और 22 क्षेत्रीय भाषाएं हैं, जिनमें से 12–15 भाषाओं की पढ़ाई विश्वविद्यालयों में इसी शैक्षणिक सत्र से शुरू हो जाएगी।
सरकार का मानना है कि यह कदम भाषा के आधार पर होने वाले संघर्षों को रोकने और सांस्कृतिक संवाद को बढ़ावा देने में मदद करेगा। इसके जरिए एमपी अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल बनेगा।
सरकारी पहल का उद्देश्य
इस योजना के पीछे मंशा है– भारतीय विविधता को सम्मान देना और भाषाओं को संवाद और जुड़ाव का माध्यम बनाना। प्रदेश के बहुत से युवा नौकरी, शिक्षा या कारोबार के लिए बाहर जाते हैं और भाषा बाधा का सामना करते हैं। इस पहल से वे न केवल अपनी मातृभाषा में पढ़ाई कर पाएंगे बल्कि अन्य राज्यों की भाषाओं और संस्कृतियों से भी परिचित होंगे। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और आपसी विश्वास भी मजबूत होगा।
विपक्ष का विरोध
हालांकि कांग्रेस ने इस योजना को चुनावी चाल बताया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता मानक अग्रवाल ने कहा कि दूसरी भाषाओं की पढ़ाई से व्यावहारिक फायदा नहीं होगा और यह केवल प्रचार का हिस्सा है। उनका आरोप है कि पहले से चल रही हिंदी माध्यम की योजनाओं का कोई असर नहीं दिखा, इसलिए यह नई योजना भी कागजों तक सीमित रह जाएगी।




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