
सुनील श्रीवास्तव हिंदी पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया का एक जाना-पहचाना नाम हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भूगोल में परास्नातक और एल.टी. की शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने 1972 में माया पत्रिका से पत्रकारिता की शुरुआत की। पांच दशकों से अधिक लंबे करियर में वे माया, धर्मयुग, नूतन कहानियां, हितवाद, ज्ञानयुग, प्रभात खबर, लोकमत समाचार, मनोरमा जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग में सक्रिय रहे। वे प्रभात खबर, लोकमत समाचार, राजवार्ता और मनोरमा के संपादक भी रहे।
पत्रकारिता के साथ-साथ वे शिक्षा के क्षेत्र में भी बेहद सक्रिय रहे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज़ में बारह वर्षों तक अध्यापन करने के अलावा, रांची विश्वविद्यालय, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल), उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन ओपन यूनिवर्सिटी (प्रयागराज) और भारती विद्या भवन (प्रयागराज) सहित कई संस्थानों में अतिथि प्रवक्ता के रूप में योगदान दिया।
साहित्य सृजन के क्षेत्र में भी उनकी गहरी पकड़ है। उन्होंने ताकि सनद रहे, खोया हुआ ठहराव, उन गलियों से गुजरते हुए जैसे कहानी संग्रह, नदी को बहने दो, सुनरी, जुड़ने का एहसास, सुक्खू नचनियां जैसे उपन्यास और सड़क में तब्दील होती पगडंडियाँ जैसा कविता संग्रह रचे हैं। धर्मवीर भारती और अमरकांत जैसे साहित्यिक हस्तियों पर संपादन कार्य भी किया है। उनकी रचनाएं धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नई कहानियां और अन्य प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। साथ ही, रेडियो और दूरदर्शन से भी उनकी कहानियां और वार्ताएं प्रसारित होती रही हैं।
अपने योगदान के लिए उन्हें हेरम्ब मिश्र स्मृति पत्रकारिता शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया। वर्तमान में वे स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं और साहित्यिक लेखन से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। साहित्य, मीडिया शिक्षा और पत्रकारिता समेत उनकी इस क्षेत्र में उपलब्धियों और मौजूदा दौर की परिस्थितियों-चुनौतियों पर उनसे लम्बी बातचीत की एड इनबॉक्स के संपादक रईस अहमद ‘लाली’ ने। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश:
आपने 1972 में माया पत्रिका से पत्रकारिता की शुरुआत की। उस दौर की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में सबसे बड़ा अंतर आप किस रूप में देखते हैं?
– 1972 में जब मैंने माया से अपने करियर की शरुआत की तो अब की पत्रकारिता से वह बहुत अलग था। तब भाषा और नैतिकता पर काफी गंभीरता से गौर किया जाता था। तब हम बलात्कार जैसे शब्द नहीं लिख सकते थे, उसकी जगह पर मुंह काला किया या कुछ दूसरे शब्दों का प्रयोग होता था। हमारे वरिष्ठ कहते थे कि जब हम बलात्कार लिखते हैं तो हमारे मष्तिष्क में एक दृश्य उभरता है जो समाज के लिए घातक है। हम किसी अपराधी को सीधे अपराधी नहीं लिख सकते थे, कथित अपराधी लिखते थे। माया में तब कहानियां प्रकाशित होती थीं, जिनमें सभी भाषाओं की कहानियां होती थीं, बाद में माया में समय के साथ बहुत कुछ बदला और वह पूरी तरह राजनीतिक हो गयी।
आज की पत्रकारिता सभी देख रहे हैं। हर तरफ गिरावट दर्ज की जा रही है। भाषा से लेकर समाज के प्रति प्रतिबद्धता तक कटघरे में है। आज मैं पत्रकारिता में नैतिकता की गिरावट, भाषा की विद्रूपता और पत्रकारिता के प्रति जूनून की कमी देखता हूँ। राजनीति सर चढ़ कर बोल रही है। जातिवाद का खतरनाक सोच समाज को बाँट रहा है जिसमें पत्रकारिता भी गहराई से शामिल है। व्यावसायिकता के गिरफ्त में पत्रकारिता पूरी आ गयी है और उसमें भी वही दोष आ गए हैं जो व्यवसाय में होते हैं।
आप प्रभात खबर, लोकमत समाचार, राजवार्ता और मनोरमा जैसे प्रकाशनों के संपादक रहे। संपादन के अनुभव ने आपके भीतर पत्रकारिता की कौन-सी नई दृष्टि विकसित की?
– प्रभात खबर हो या लोकमत समाचार ये समाचार पत्र थे जब कि राजवार्ता और मनोरमा का आकाश दूसरा था। पाठक भी अलग थे। हाँ, प्रभात खबर और लोकमत समाचार समाज के प्रति जिम्मेदार थे। रांची जो एक आदिवासी बहुल, झारखंड आन्दोलन अपने चरम पर था। वहां से भाजपा समर्थक अखबार रांची एक्सप्रेस पहले से निकल रहा था। इसलिए प्रभात खबर के समक्ष एक चुनौती तो थी जिसे उसने बहुत सीमा तक पूरा भी किया, लेकिन बाद में पटना से हिन्दुस्तान और नवभारत टाइम्स के आने से स्थिति में बदलाव आया जिसका मुख्य कारण प्रभात खबर के प्रबन्धन का आर्थिक रूप से कमजोर होना था। प्रभात खबर हिन्दी का पहला अखबार था, जिसने समाचार के साथ विचार देना प्रारम्भ किया था। इसके साथ ही यह हिन्दी का पहला अखबार था जो अपना साहित्य परिशिष्ट पत्रिका की आकार में बत्तीस पृष्ठ का प्रकाशित करता था, इसलिए यह समाज के हर वर्ग में पढ़ा जाता था। लेकिन बाद में मालिकों के आपसी झगडे में इसका बहुत नुक्सान हुआ और अंत में उषा मार्टिन के हाथों बेच दिया गया। उसकी कहानी अलग है।
लोकमत समाचार अहिन्दी भाषी क्षेत्र में एक चुनौती के साथ निकला था। नागपुर में नवभारत एक पुराना अखबार था। उसके साथ लोकमत समाचार का सीधा टक्कर था, लेकिन लोकमत का नेटवर्क बहुत बड़ा था। लोकमत मराठी का पूरे महारष्ट्र में एकाधिकार था और आज भी है। उसका लाभ लोकमत समाचार को मिला, साथ ही लोकमत समाचार ने अपने परिशिष्टों के भी अन्य समाचार पत्रों से अलग रखा। रविवारीय परिशिष्ट लोकरंग के साथ महिलाओं के लिए अलग अंतराल और फिल्म के लिए अलग परिशिष्ट रखे। भाषा पर अधिक बल दिया जिससे मराठी भाषी भी समझ सकें। बहुत जल्दी ही लोकमत समाचार पाठकों के बीच लोकप्रिय हो गया। पहले पृष्ठ पर 25/4 से ज्यादा विज्ञापन नहीं लेते थे। विज्ञापन और पठनीय सामग्री का अनुपात भी नियमानुसार ही होता था। आज लोकमत समाचार महाराष्ट्र का सबसे अधिक बिकने वाला हिन्दी अखबार हो गया है लेकिन उसके साथ भी वही सब जुड़ गया है जो आज की पत्रकारिता के साथ जुड़ गया है।
खरब प्रबन्धन के कारण राजवार्ता का सिर्फ एक अंक निकला था, वह भी दो वर्ष बाद। लेकिन मनोरमा बंद होने के बाद दोबारा लगभग पांच वर्षों तक निकला लेकिन अपने पुराने गौरव को प्राप्त नहीं कर सका क्योंकि उसके पास जो पुराने संसाधन थे भैयन के आपसी लड़ाई में समाप्त हो गया था। सत्य कथा अन्य दो भाइयों के पास आ गया था और मनोहर कहानिया दो भाइयों के पास और मनोरमा तथा माया विभाजन के कारण सब कुछ तहस नहस हो गया था।
मैंने इतने संस्थानों में काम करने के बाद एक बात स्पष्ट रूप से देखा था कि यदि आप को सफल पत्रकार होना है तो प्रबन्धन के प्रिय बने रहिये। चाटुकारिता और लाइजिनिंग में समय ज्यादा दीजिये। बाकी अखबार निकालने का काम तो स्टाफ कर ही लेगा। मैंने यही काम कभी नहीं किया।
मालिकों का राजनीति में प्रवेश शुरू हो चुका था। राज्यसभा में जाना उनका उद्देश्य हो गया था, और यही प्रबल इच्छा पत्रकारों में भी हो गयी थी। कुछ ने सफलता भी अर्जित की जिनका नाम लेने की ज़रुरत मैं नहीं समझता। मैंने अपने को राजनीति से अलग हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाने की कोशिश की, कहाँ तक सफल हो पाया इसका अनुमान मैं नहीं लगा सकता।
वर्तमान में भारत में पत्रकारिता शिक्षा की स्थिति कैसी है?
– पत्रकारिता की शिक्षा भी व्यावहारिक नहीं रह गयी है। विज्ञान में जैसे थ्योरी और प्रैक्टिकल होता था, वैसे ही आज पत्रकारिता की शिक्षा में भी है। व्यवसायिक सिक्षा तो हो गयी है लेकिन व्यावहारिक ज्ञान की कमी है। संस्थानों से निकलकर छात्र भटक रहे हैं। शिक्षा तो उन्हें सैद्धांतिक रूप में रिपोर्टंग, लेखन, विज्ञापन, प्रबन्धन, न्यू मीडिया आदि का ज्ञान तो दिया जाता है लेकिन व्यावहारिक ज्ञान उन्हें नहीं मिल पाता। पहले संगीत और पत्रकारिता में अनुभवी अध्यापकों की नियुक्ति होती थी, लेकिन आज यूजीसी के मानक के अनुसार अध्यापक रखे जाते हैं जो किताबी ज्ञान तो दे देते हैं लेकिन व्यावहारिक ज्ञान नहीं दे पाते क्योंकि उनके पास यह है ही नहीं।
हिंदी पत्रकारिता में वर्तमान समय में आपको सबसे बड़ी चुनौती क्या दिखाई देती है?
– हिन्दी पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती भाषा, कंटेंट और कमिटमेंट की है। जूनून कहीं नहीं दिखाई देता। ईमानदारी भी नहीं दिखाई देती। महानगरों के पत्रकार छोटे शहरों के पत्रकारों को पत्रकार मानते ही नहीं। यही नहीं, हिन्दी पत्रकारिता भी सेलेक्टिव हो गयी है।
डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रम में क्या बदलाव किए जा सकते हैं?
– डिजिटल और सोशल मीडिया का प्रभाव बढ़ रहा है और बढ़ेगा आगे भी, इसकी कोई सीमा तय नहीं की जा सकती। हाँ, समय-समय पर पाठ्यक्रम बदले जा रहे हैं और बदले जाएंगे। तकनीक उन्नत होती गयी तो उसे पाठ्यक्रम रखा गया और समय-समय पर जो भी सामाजिक या तकनीकी अथवा डिजिटल- सोशल बदलाव होंगे, उसी के अनुसार पाठ्यक्रम भी बदले जायेंगे। बिना बदलाव के शिक्षा अधूरी ही नहीं बल्कि असामयिक भी हो जायेगी, उसका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। इसलिए बदलाव होते रहेंगे।
आपके अनुभव में छात्र किन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा कमजोर रहते हैं और उन्हें सुधारने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?
– छात्र अगर कहीं कमजोर हैं तो वह भाषा और समसामयिक विषय है। हालांकि जो छात्र पत्रकारिता में आ रहे हैं, उन्हें बदलते समय के साथ यह इल्म भी हो रहा है कि उन्हें यदि इस क्षेत्र में बने रहना है तो अपने को हर क्षेत्र में अपडेट रहना होगा।
मीडिया उद्योग में वर्तमान ट्रेंड और अवसर क्या हैं?
-आज की पत्रकारिता समाज से पूरी तरह कट गयी है। राजनीति से चिपककर चलने वाली प्त्रार एवं पत्रकारिता को आज गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। मुझे यह कहने में ज़रा भी गुरेज नहीं है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने पत्रकारिता को बहुत नुक्सान पहुंचाया है। राजनीतिक विश्लेष्ण के नाम पर जितने भी यू ट्यूब चैनल चल रहे हैं इनसे भी पत्रकारिता का ह्रास हुआ है। यह कह सकते हैं कि हो रहा है, अपवाद की बात मैं नहीं कर रहा हूँ।
क्या आप मानते हैं कि प्रिंट मीडिया की तुलना में डिजिटल मीडिया में करियर के अवसर अधिक हैं?
– जहां तक करियर का सवाल है वह हर क्षेत्र में है, बस अपने को उसके अनुसार ढालना होगा। कुछ तो अपने संस्थान से ज्ञान लेकर आते हैं बाकी कार्यक्षेत्र में सीख जाते हैं। अब पत्रकारिता को काफी विस्तार मिल चुका है। प्रिंट में तनिक कम है लेकिन डिजिटल में काफी स्कोप है।
पत्रकारिता में एथिक्स (नैतिकता) और सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के महत्व पर आपके विचार क्या हैं?
– कभी भी नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी को कैसे नकारा जा सकता है। सब कुछ इसी पर तो निर्भर है। अगर इसमें से कुछ भी लचका तो सब तितर बितर हो जाएगा।
मीडिया के क्षेत्र में आने वाले नए तकनीकी बदलाव जैसे AI और डेटा जर्नलिज्म के बारे में आपकी राय क्या है?
– किसी भी तरह के बदलाव को स्वीकार तो करना ही होगा वरना भविष्य उन्नत नहीं हो सकता लेकिन इसके साथ ही साथ इसके दुरुपयोग के बारे में भी सतर्क रहना होगा। चूंकि मुझे लगभग एक दशक पत्रकारिता और अध्यापन से अलग हुए हो गया, इसलिए बहुत कुछ कहना संभव नहीं है।
आपके अनुसार मीडिया शिक्षा और अकादमिक अनुसंधान का वास्तविक मीडिया उद्योग में क्या योगदान है?
– किसी भी क्षेत्र में अनुसंधान की अनदेखी नहीं की जा सकती, इससे नए आयाम तलाशे जाते हैं जो भविष्य में एक राह बनाते हैं। आज पत्रकार और पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती पत्रकारिता का राजनीतिकरण है। पत्रकारिता घूम-फिरकर राजनीति पर टिक गयी है जिसके कारण पत्रकार के आचरण पर भी संदेह होने लगा है। तकनीक कोई चुनौती नहीं है वह तो व्यवसाय या उद्योग की सफलता के लिए आवश्यक है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों में आपने पत्रकारिता का अध्यापन किया। कक्षा में आने वाले विद्यार्थियों की सोच और सवालों ने आपको किस तरह प्रभावित किया?
– इलाहाबाद विश्वविद्यालय ही नहीं, अन्य संस्थानों में छात्र बहुत जिज्ञासु दिखाई पड़े। समसामयिक बदलाव के प्रति भी वह सचेत थे और आज भी हैं। हाँ, क्षेत्र अलग हो सकते हैं जैसे- कोई स्क्रिप्ट पर ध्यान देना चाहता है तो कोई सम्पादन में दिलचस्पी रखता है, कुछ छात्र कैमरे का चुनते हैं और तदनुसार प्रश्न भी पूछते हैं और उसका निवारण करना ही शिक्षक का पहला कर्तव्य होता है। आज छात्र स्वयं जिज्ञासा गूगल आदि के माध्यम से शांत करते हैं।
आपको क्या लगता है, आज के पत्रकारिता संस्थान विद्यार्थियों को बदलती मीडिया दुनिया की चुनौतियों के लिए कितनी अच्छी तरह तैयार कर पा रहे हैं?
– वर्तमान में सभी संस्थान तो नहीं लेकिन बहुत से ऐसे संस्थान हैं जो छात्रों को शिक्षा के सारे इक्विपमेंट उपलब्ध कराते हैं, फीस भी लाखों में लेते हैं। वह भी शिक्षा को व्यवसाय समझते हैं और उसी तरह व्यावसायिक शिक्षा दे भी रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि अन्य क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी विद्यार्थी संस्थानों से निकल ज्यादा रहे हैं, ऐब्जार्ब कम हो रहे हैं, अनुपात ज्यादा है।
किन कौशलों और अनुभवों पर छात्रों को विशेष ध्यान देना चाहिए?
– एक पत्रकार को अध्ययनशील, ईमानदार, अच्छी भाषा और समाज के प्रति जागरूक होना चाहिए। साफ़ सोच और किसी भी वाद से दूर रहना चाहिए। आज पत्रकारिता की शिक्षा जो विभिन्न संस्थानों में दी जा रही है, उससे मैं बहुत ज्यादा आशान्वित नहीं हूँ। पत्रकारिता तकनीक नहीं है। वह इससे परे है। समाज में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही स्थितियां बनती-बिगड़ती रही हैं। पहले पत्रकारिता का सरोकार समाज से ही जुड़ता है, लेकिन आज समाज पत्रकारिता से समाज अनुपस्थित है। राजनीति कहीं बहुत ऊपर हो गयी है जो पत्रकारिता के मूल स्वभाव को क्षति पहुंचा रही है। आज संस्थानों में तकनीकी शिक्षा ज्यादा दी जा रही है। अनुभवी अध्यापकों की निहायत कमी है, इसलिए उन्हें व्यावहारिक ज्ञान नहीं मिल पाता है।
आपने कहानियां, उपन्यास और कविताएं लिखीं। पत्रकारिता और साहित्य—इन दोनों के लेखन में आपके अनुभव में सबसे बड़ा फर्क क्या है?
– समय के साथ साहित्यिक विधाओ के कथ्य और शिल्प में परिवर्तन हुआ है, लेखकों के सोशल कमिटमेंट में भी कमी आयी है। मैं जब लिख रहा था तो साहित्यिक पत्रिकाएं बहुत थीं। नई कहानी के रचानाकारों के साथ साठोत्तरी पीढी भी अनवरत लिख रही थी। साठोत्तरी पीढी के बाद हमारी पीढी में भी बहुत से रचानाकार बड़ी शिद्दत के साथ लिख रहे थे, जो आज भी कमोबेश लिख रहे हैं।
आपके लंबे अनुभव को देखते हुए, युवा पत्रकारों और लेखकों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
– रईस भाई, आज किसी को भी कोई सन्देश देना बहुत मुश्किल है। मैं बस यही कहूंगा कि जिस भी क्षेत्र में जाएँ पूरी ईमानदारी के साथ, पूरे कमिटमेंट के साथ।




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