
सात साल की वकालत पूरी कर चुके न्यायिक अधिकारी अब बार कोटा (Bar Quota) के तहत जिला जज (District Judge) बनने के पात्र होंगे। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया कि संविधान की व्याख्या कठोर (pedantic) नहीं बल्कि जीवंत और लचीली (organic) होनी चाहिए।
न्यायिक सेवा और बार के अधिकारों में संतुलन
संविधान पीठ ने कहा कि यह निर्णय न्यायिक सेवा और बार—दोनों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखेगा। साथ ही, कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि वे अपने-अपने नियमों में संशोधन करें और संबंधित हाई कोर्ट से परामर्श लेकर ऐसा प्रावधान करें, जिससे न्यायिक अधिकारी भी बार कोटा के तहत जिला जज की परीक्षा में शामिल हो सकें।
न्यूनतम आयु सीमा 35 वर्ष तय
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला आगे से लागू (prospective effect) होगा और पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रियाओं या नियुक्तियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि न्यायिक सेवा और बार के उम्मीदवारों के बीच समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम आयु सीमा 35 वर्ष रखी जाए।
क्यों जरूरी था यह फैसला?
2019 में केरल हाई कोर्ट ने एक ऐसे उम्मीदवार की नियुक्ति रद्द कर दी थी जो पहले वकील था और बाद में मुनसिफ (निचली अदालत का जज) बन गया था, लेकिन उसने जिला जज की सीधी भर्ती परीक्षा में भी भाग लिया था। हाई कोर्ट ने कहा कि वह “बार कोटा” का उम्मीदवार नहीं माना जा सकता क्योंकि आवेदन के समय वह वकालत नहीं कर रहा था।
यह मामला बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहाँ ‘धीरेज मोर केस’ के तहत बने नियमों की वैधता पर सवाल उठा। अब पांच जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि वकालत और न्यायिक सेवा—दोनों का अनुभव न्यायिक दक्षता में योगदान देता है, इसलिए दोनों को मिलाकर देखा जाएगा।
कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ
कुशल उम्मीदवारों को अवसर मिलना चाहिए: कोर्ट ने कहा कि युवा और योग्य न्यायिक अधिकारियों को अवसर से वंचित करना न्याय के हित में नहीं है।
बार कोटा का प्रतिशत तय नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 233(2) में वकीलों के लिए किसी आरक्षण या प्रतिशत का प्रावधान नहीं है।
सर्वश्रेष्ठ का चयन हो: कोर्ट ने दोहराया कि किसी भी सार्वजनिक सेवा में चयन प्रक्रिया का उद्देश्य सबसे उपयुक्त और सक्षम व्यक्ति का चयन होना चाहिए।
यह ऐतिहासिक फैसला न केवल न्यायिक करियर की नई संभावनाएँ खोलता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि न्यायपालिका में अनुभव और योग्यता—दोनों को समान महत्व मिले। अब न्यायिक अधिकारी और वकील दोनों एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकेंगे — सर्वोत्तम न्याय सुनिश्चित करना।




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