
कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में एक नाम आज शिक्षा की नई उम्मीद बन चुका है— के. नारायण नाइक, जिन्हें छात्र प्यार से “स्कॉलरशिप मास्टर” कहते हैं।83 वर्षीय यह पूर्व सरकारी शिक्षक पिछले दो दशकों से गरीब और जरूरतमंद छात्रों को छात्रवृत्ति दिलाने के मिशन पर हैं। 38 वर्षों तक अध्यापन के बाद जब 2001 में वे सेवानिवृत्त हुए, तो उन्होंने विश्राम नहीं, बल्कि समाज सेवा को अपनी नई जिम्मेदारी बना लिया।
₹40,000 की सीमित पेंशन में से भी वे अपनी अधिकांश राशि छात्रों की मदद और यात्राओं में खर्च कर देते हैं। हर सुबह वे अपनी पुरानी बाइक या सार्वजनिक परिवहन से निकल पड़ते हैं — गांव-गांव, स्कूल-स्कूल और कॉलेज-कॉलेज जाकर छात्रों को स्कॉलरशिप योजनाओं की जानकारी देते हैं और आवेदन प्रक्रिया में मार्गदर्शन करते हैं। “हर साल मैं लगभग 350 शैक्षणिक संस्थानों तक पहुँचता हूँ,” नाइक मुस्कुराते हुए कहते हैं।
संघर्षों से सेवा तक
नाइक का बचपन एक गरीब किसान परिवार में बीता। जब उन्होंने पढ़ने की इच्छा जताई, तो पिता ने विरोध किया — लेकिन नाइक ने गांधीवादी राह चुनी। उन्होंने अहिंसक विरोध और भूख हड़ताल के ज़रिए अपने पढ़ने के अधिकार के लिए संघर्ष किया। यही जज़्बा आगे चलकर उनके जीवन का आधार बना।
उन्होंने खुद देखा कि कैसे आर्थिक तंगी कई प्रतिभाशाली छात्रों के भविष्य को रोक देती है। इसलिए सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने ठान लिया — अब वे खुद छात्रों और अवसरों के बीच पुल बनेंगे। 2007 से उन्होंने इसे पूर्णकालिक कार्य बना लिया।
आज वे सुप्रजित फाउंडेशन, द्युति फाउंडेशन और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर हर साल लगभग ₹16 लाख की छात्रवृत्तियाँ वितरित करते हैं। अब तक उनके प्रयासों से एक लाख से अधिक छात्रों को लगभग ₹5 करोड़ की स्कॉलरशिप मिल चुकी है।
शिक्षा की लौ जलाए रखने वाला शिक्षक
नाइक के अथक प्रयासों से दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों का शैक्षणिक परिदृश्य बदल चुका है। कई सरकारी अधिकारी मानते हैं कि उनके कारण ही ग्रामीण इलाकों में ड्रॉपआउट दर घटी है।
जिला शिक्षा अधिकारी जी. रमेश कहते हैं— “नाइक सर के हस्तक्षेप से सैकड़ों छात्रों के सपने अधूरे नहीं रह गए। उन्होंने शिक्षा को सचमुच सबके लिए सुलभ बनाया है।”
कई छात्र उन्हें “पिता समान मार्गदर्शक” मानते हैं। उनके लिए नाइक सिर्फ एक शिक्षक नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत हैं। “मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी तब होती है जब कोई छात्र फोन करके बताता है कि वह अब इंजीनियर या डॉक्टर बन गया है,” नाइक कहते हैं।
सेवा ही सच्चा पुरस्कार
नाइक ने कभी अपनी सेवा के लिए आर्थिक मदद स्वीकार नहीं की। वे कहते हैं- “मेरे लिए छात्रों की सफलता ही सबसे बड़ा इनाम है।” 83 वर्ष की उम्र में भी वे रोज़ाना सैकड़ों किलोमीटर का सफ़र करते हैं।
उनकी लगन, विनम्रता और निःस्वार्थ समर्पण ने उन्हें कर्नाटक का “स्कॉलरशिप मास्टर” बना दिया है। उनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि “सेवानिवृत्ति अंत नहीं, समाज सेवा की नई शुरुआत हो सकती है।”




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