
सीनियर एडवोकेट और पूर्व मुख्य न्यायाधीश डॉ. एस. मुरलीधर ने कहा है कि भारत में आज शैक्षणिक स्वतंत्रता गंभीर खतरे में है, असहमति को दबाया जा रहा है और न्यायिक प्रक्रिया स्वयं सज़ा बन चुकी है। वे यह बात प्रो. जी.एन. साईबाबा मेमोरियल लेक्चर के दौरान कह रहे थे।
उन्होंने प्रो. साईबाबा को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वे “साहस और आशा के प्रतीक” थे। प्रो. साईबाबा, दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के शिक्षक थे जिन्हें UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था। 2017 में सजा सुनाई गई, हालांकि 2022 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अगले ही दिन उस आदेश पर रोक लगा दी। गंभीर बीमारी और व्हीलचेयर पर निर्भरता के बावजूद उन्हें जमानत नहीं मिली। 2024 में दोबारा बरी होने के कुछ समय बाद ही उनका निधन हो गया।
डॉ. मुरलीधर ने सवाल उठाया — “सिस्टम की इस निर्दयता की जिम्मेदारी कौन लेगा?”
भारत की गिरती वैश्विक स्थिति
डॉ. मुरलीधर ने 2025 के Academic Freedom Index का हवाला देते हुए कहा कि भारत अब उन देशों में शामिल है जहाँ शैक्षणिक स्वतंत्रता “लगभग समाप्त” हो चुकी है। 2013 में भारत “पूरी तरह स्वतंत्र” देशों में था, लेकिन अब यह सीरिया और ईरान जैसे देशों के स्तर पर पहुंच गया है।
उन्होंने तीन घटनाओं का उदाहरण दिया:
- इंदौर लॉ कॉलेज (2022):
प्रो. इनामुल रहमान पर “हिंदू विरोधी किताब” रखने का आरोप लगाकर FIR दर्ज की गई, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इसे “मूर्खतापूर्ण” करार दिया।
- मुजफ्फरनगर स्कूल (2023):
एक शिक्षिका ने मुस्लिम छात्र से सहपाठियों के थप्पड़ लगवाए, जिसे अदालत ने RTE का उल्लंघन माना।
- तमिलनाडु जाति हमला (2023):
दलित छात्र पर ऊँची जाति के छात्रों ने दरांती से हमला किया। सरकार ने इस पर सुधारात्मक कदम उठाने का आदेश दिया।
“विचारधारा का आतंक” और संस्थागत नियंत्रण
डॉ. मुरलीधर ने कहा कि कट्टर समूह विश्वविद्यालय परिसरों में हस्तक्षेप कर रहे हैं, और “लेफ्ट-लिबरल” विचारों वाले शिक्षकों को निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने रामचंद्र गुहा, डॉ. फिरोज़ खान और प्रो. सब्यसाची दास के उदाहरण दिए— जिन्हें विचारधारात्मक दबाव के चलते अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा।
उन्होंने कहा कि भारत में शैक्षणिक स्वतंत्रता को जाति, वर्ग और साम्प्रदायिक भेदभाव की दीवारों के बीच जीवित रखना एक बड़ी चुनौती है। उनका प्रश्न था— “हम विश्वविद्यालयों को फिर से धर्मनिरपेक्ष और मुक्त विचारों का केंद्र कैसे बना सकते हैं?”
अपने संबोधन का समापन उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 1986 के बिजॉय इमैनुअल मामले का हवाला देते हुए किया— “हमारा संविधान सहिष्णुता का अभ्यास करता है।”




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