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लीडरशिप का नया दृष्टिकोण: रोज़मर्रा की बातचीत से भी हो सकती है प्रभावी कोचिंग

कई लीडर्स का मानना है कि कार्यस्थल पर कोचिंग या प्रशिक्षण एक बड़ी, जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया होती है। लेकिन हकीकत में, कोचिंग हर दिन की छोटी-छोटी बातचीत में भी संभव है। यह किसी तय नियमों या कठोर ढांचे से बंधी प्रक्रिया नहीं है।

 

जब कोई लीडर अनौपचारिक रूप से बात करता है—जैसे मीटिंग के बाद दो मिनट की सलाह देना, सफर के दौरान किसी को मार्गदर्शन देना या ऑनलाइन संदेश भेजना—तो ये छोटे-छोटे कदम भी कोचिंग का ही हिस्सा होते हैं। ऐसे सहज और सच्चे संवाद टीम के सदस्यों में आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, काम के प्रति स्पष्टता लाते हैं और उनकी पेशेवर क्षमता को मजबूत बनाते हैं।

 

अनपेक्षित पलों का करें सही उपयोग

सबसे असरदार कोचिंग अकसर उन छोटे, अनपेक्षित पलों में होती है, जो बिना किसी तैयारी के सामने आते हैं। यह केवल सलाह देने तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे सवाल पूछने की कला है जो सामने वाले को खुद सोचने और जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित करे।

 

इसे ‘पॉपकॉर्न कोचिंग (Popcorn Coaching)’ कहा जाता है, क्योंकि ये अवसर अचानक उभरते हैं—जैसे किसी मीटिंग के बाद या व्हाट्सएप चैट के दौरान—और सिर्फ कुछ मिनट चलते हैं। एक प्रभावी लीडर की जिम्मेदारी होती है कि वह इन पलों को पहचानें, सही सवाल पूछें और लोगों को सोचने व आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें।

 

अनुभव साझा करना भी है सशक्त कोचिंग

नई प्रतिभाएं जब लीडर्स को काम करते हुए देखती हैं, तो वे उनके काम करने का तरीका, सोच और व्यवहार समझती हैं। अगर मीटिंग से पहले लीडर किसी खास बिंदु पर ध्यान देने को कहें और बाद में कुछ मिनट बात कर यह पूछें कि उन्हें क्या नया अनुभव हुआ या वे क्या अलग कर सकते हैं, तो सामान्य कार्य अनुभव एक सीखने का अवसर बन जाता है।

 

यह तरीका टीम के सदस्यों में आत्मविश्वास बढ़ाता है, कौशल विकसित करता है और उन्हें भविष्य की जिम्मेदारियों के लिए तैयार करता है।

 

संबंध और जुड़ाव से बढ़ती है सीखने की शक्ति

कोचिंग सिर्फ सलाह देने तक सीमित नहीं है। लीडर्स अपनी टीम को सही अवसरों और सही विशेषज्ञों से जोड़कर भी मार्गदर्शन देते हैं। ऐसे लीडर्स अपनी टीम को उन लोगों से मिलवाते हैं जो किसी कौशल को बेहतर तरीके से सिखा सकते हैं।

 

उदाहरण के तौर पर, जब कोई वरिष्ठ लीडर अपनी टीम के प्रतिभाशाली सदस्य को कंपनी के किसी अनुभवी मेंटर से मिलवाता है, तो मेंटर उसकी क्षमता को पहचानता है और उसे बड़े प्रोजेक्ट्स में शामिल होने का मौका देता है। ऐसे अवसर कुछ ही वर्षों में उस सदस्य को पदोन्नति या नेतृत्व की भूमिका तक पहुंचा सकते हैं।

 

गेम्बा कोचिंग: वास्तविक कार्यस्थल पर सीखने की कला

‘गेम्बा (Gemba)’ का अर्थ है — वह असली जगह जहाँ काम वास्तव में होता है। गेम्बा कोचिंग का उद्देश्य लोगों की सोच को समझना और उन्हें उसी समय उनके कार्यस्थल पर बेहतर निर्णय लेने में मदद करना है। इस प्रक्रिया में लीडर यह पूछते हैं — “आपने यह कदम क्यों उठाया?” या “इस स्थिति में आप और क्या कर सकते थे?”

 

इस प्रकार की कोचिंग से व्यक्ति अपने निर्णयों के हर छोटे पहलू को समझने, विश्लेषण करने और अधिक सजग बनने की क्षमता विकसित करता है।

 

Asmita Sarkar

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