
भारत और अमेरिका दोनों में काम कर चुकीं कुशल भारतीय आईटी पेशेवर वैष्णवी श्रीनिवासगोपालन अब चीन में नौकरी की तलाश में हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र के पेशेवरों के लिए बीजिंग का हाल ही में शुरू किया गया ‘के-वीजा’ कार्यक्रम उनके इस सपने को साकार करने का रास्ता खोल सकता है।
बीते महीने चीन ने यह नया वीजा प्रोग्राम शुरू किया है, जो वैश्विक स्तर पर प्रतिभा और अत्याधुनिक तकनीक की दौड़ में अमेरिका से आगे निकलने की चीन की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
श्रीनिवासगोपालन का कहना है कि वह कुछ साल पहले अपने पिता के चीन के एक विश्वविद्यालय में काम करने के दौरान वहां की कार्यसंस्कृति से बेहद प्रभावित हुई थीं। उन्होंने कहा, “चीन का के-वीजा, अमेरिका के एच-1बी वीजा जैसा है। मेरे जैसे तकनीकी पेशेवरों के लिए यह विदेश में काम करने का एक बेहतर विकल्प है।”
बिना नौकरी प्रस्ताव के आवेदन की सुविधा
चीन का यह नया के-वीजा मौजूदा आर-वीजा जैसे कार्यक्रमों का पूरक है, लेकिन इसमें कई बड़ी रियायतें दी गई हैं। सबसे अहम बात यह है कि आवेदन करने से पहले आवेदक को नौकरी का प्रस्ताव दिखाना जरूरी नहीं है, यानी कोई भी योग्य पेशेवर पहले आवेदन कर सकता है और बाद में चीन में अवसर तलाश सकता है।
इसके विपरीत, अमेरिका ने हाल के वर्षों में एच-1बी वीजा को लेकर सख्ती बढ़ा दी है। ट्रंप प्रशासन के दौरान इस वीजा की फीस को बढ़ाकर 1 लाख अमेरिकी डॉलर तक कर दिया गया था। साथ ही, विदेशी छात्रों और विद्वानों के लिए कठोर नीतियों के कारण कई गैर-अमेरिकी पेशेवर अब वैकल्पिक विकल्पों की तलाश कर रहे हैं — और चीन इसका सबसे बड़ा लाभ उठा रहा है।
चीन का लक्ष्य: तकनीकी नेतृत्व
बीजिंग का मकसद सिर्फ विदेशी पेशेवरों को आकर्षित करना नहीं है, बल्कि वह उन्नत तकनीकों में वैश्विक नेतृत्व हासिल करना चाहता है। चीन की सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), अर्धचालक (semiconductors), रोबोटिक्स और बायोटेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में शोध और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारी सरकारी सब्सिडी जारी की है।
चीन की यह नीति साफ संकेत देती है कि वह ‘ब्रेन ड्रेन’ के बजाय ‘ब्रेन गेन’ पर जोर दे रहा है — यानी दुनिया भर से प्रतिभाशाली दिमागों को अपने देश में आकर्षित कर एक नई तकनीकी शक्ति के रूप में उभरना चाहता है।
अमेरिका बनाम चीन: वीजा नीति की नई जंग
जहां अमेरिका की सख्त वीजा नीतियां विदेशी प्रतिभाओं को सीमित कर रही हैं, वहीं चीन अपने दरवाजे खोलकर एक “टैलेंट-फ्रेंडली डेस्टिनेशन” बनने की दिशा में बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन अपने इस वीजा सिस्टम को पारदर्शी और प्रभावी बनाए रखता है, तो आने वाले वर्षों में वह तकनीकी और वैज्ञानिक प्रतिभा के वैश्विक केंद्र के रूप में अमेरिका को कड़ी चुनौती दे सकता है।
संक्षेप में कहा जाए तो, चीन अब सिर्फ दुनिया की फैक्ट्री नहीं, बल्कि दिमागों का हब बनने की राह पर है — और उसका नया के-वीजा इस दिशा में उठाया गया सबसे बड़ा कदम माना जा रहा है।




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