
कभी दुनिया को सबसे बेहतरीन वैज्ञानिक, इंजीनियर और इनोवेटर देने वाला अमेरिका अब करियर की एक नई दिशा देख रहा है। जहां कभी युवा पीढ़ी साइंस और टेक्नोलॉजी में करियर बनाने का सपना देखती थी, वहीं अब जेनरेशन Z (1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा) बड़ी संख्या में ब्लू-कॉलर जॉब्स जैसे — प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, कारपेंटर, वेल्डर और कुक — की ओर रुख कर रही है।
नवीनतम सर्वेक्षणों के अनुसार, अमेरिकी युवाओं में अब “हाथों से काम करने वाले पेशे” के प्रति झुकाव तेजी से बढ़ा है। ResumeBuilder की एक रिपोर्ट बताती है कि हर पांच में से दो अमेरिकी युवा ब्लू-कॉलर जॉब्स को अपनाना चाहते हैं। इनका मानना है कि भविष्य केवल डिग्री से नहीं, बल्कि स्किल्स से तय होगा। यही कारण है कि अमेरिका में वोकेशनल और ट्रेड कोर्सेज में दाखिले रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ रहे हैं, जबकि चार वर्षीय कॉलेज डिग्री कोर्स में दाखिले लगातार घट रहे हैं।
क्यों बदल रहे हैं अमेरिकी युवाओं के करियर विकल्प?
इस बदलाव के पीछे तीन प्रमुख कारण सामने आए हैं — महंगी कॉलेज शिक्षा, ऑटोमेशन का डर, और डिग्री के बावजूद बेरोजगारी।
- ऑटोमेशन और AI का बढ़ता प्रभाव
अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल ने कई सेक्टरों में नौकरियां खत्म कर दी हैं। पिछले कुछ वर्षों में टेक और फाइनेंस सेक्टर में लाखों लोगों की छंटनी हुई है। इसके उलट, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, या वेल्डर जैसी नौकरियां ऐसी हैं जिन पर AI का सीधा असर लगभग न के बराबर है। यही वजह है कि युवा इन स्थिर नौकरियों को सुरक्षित भविष्य के रूप में देख रहे हैं।
- कॉलेज की बढ़ती लागत
अमेरिका में उच्च शिक्षा की लागत अब कई परिवारों के लिए भारी बोझ बन चुकी है। एक सरकारी विश्वविद्यालय से बैचलर्स डिग्री की औसत लागत 22 से 35 लाख रुपये है, जबकि निजी संस्थानों में यह 26 से 45 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है। इतने महंगे कोर्स के बाद भी नौकरी की गारंटी नहीं होने से युवा अब “स्किल बेस्ड एजुकेशन” को अधिक महत्व दे रहे हैं।
- डिग्री के बाद भी बेरोजगारी
महंगी डिग्री लेने के बावजूद युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही। Forbes की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में कंप्यूटर इंजीनियरिंग के ग्रेजुएट्स में 7.5% और कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट्स में 6.1% बेरोजगारी दर दर्ज की गई है। अन्य क्षेत्रों के छात्र भी इसी स्थिति से जूझ रहे हैं। इससे कई युवाओं में यह विश्वास पनपा है कि महंगी डिग्री के बजाय व्यावहारिक कौशल सीखना ही बेहतर विकल्प है।
ब्लू-कॉलर जॉब्स में भी मिल रही है मोटी सैलरी
रिपोर्ट बताती है कि आज ब्लू-कॉलर पेशे भी अच्छी कमाई के अवसर दे रहे हैं। ResumeGenius के अनुसार एलिवेटर और एस्केलेटर टेक्नीशियन सालाना ₹94 लाख से ₹1.32 करोड़ तक कमा रहे हैं। इलेक्ट्रिकल पावरलाइन इंस्टॉलर्स की सालाना सैलरी ₹82 लाख से ₹1.12 करोड़ के बीच है। प्लंबर, पाइपफिटर्स और स्टीमफिटर्स ₹55 लाख से ₹93 लाख तक कमा रहे हैं। इलेक्ट्रिशियन की औसत सैलरी ₹55 लाख से ₹1 करोड़ तक है।
इन आंकड़ों से साफ है कि अब ब्लू-कॉलर नौकरियां न केवल स्थिरता और सम्मान दे रही हैं, बल्कि आर्थिक रूप से भी आकर्षक बनती जा रही हैं।
करियर का बदलता चेहरा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव अमेरिकी समाज के सोचने के तरीके में एक नई क्रांति का संकेत है। जहां पहले “व्हाइट-कॉलर जॉब्स” सफलता की पहचान मानी जाती थीं, वहीं अब “ब्लू-कॉलर ट्रेड्स” को एक सम्मानजनक और स्थायी करियर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
आने वाले वर्षों में यह ट्रेंड न सिर्फ अमेरिका, बल्कि दुनिया के अन्य देशों में भी युवाओं के करियर विकल्पों को प्रभावित कर सकता है।
अमेरिका में जेन Z का यह रुझान बताता है कि अब करियर का अर्थ केवल डिग्री नहीं, बल्कि कौशल, स्थिरता और आत्मनिर्भरता बन गया है। जब तक समाज कौशल को डिग्री जितना महत्व नहीं देगा, तब तक रोजगार का संतुलन नहीं बनेगा — और शायद यही सोच अमेरिका को एक नई कार्य संस्कृति की ओर ले जा रही है।




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