
“जहां चाह, वहां राह”—इस कहावत को हकीकत में बदल रहा है कोंडागांव विकासखंड के लेमड़ी पंचायत स्थित उच्च प्राथमिक शाला पीकड़भाटा। यहां बच्चे सिर्फ किताबों से नहीं, बल्कि खेतों में हाथ गंदे करके भी सीख रहे हैं। स्कूल में हर साल शिक्षक, पालक और छात्र मिलकर धान और सब्जियों की खेती करते हैं, और इस वर्ष की भरपूर फसल ने पूरे गांव में उत्साह बढ़ा दिया है।
खेत ही कक्षा बने, बच्चे सीख रहे असली जीवन कौशल
स्कूल परिसर की जमीन पर पालक किसान हल चलाते हैं, जबकि बच्चे रोपा लगाने से लेकर पौधों को पानी देने तक हर प्रक्रिया में शामिल होते हैं। जून से नवंबर तक धान की खेती की जाती है, और इसके बाद नवंबर से अप्रैल तक किचन गार्डन में हरी सब्जियां उगाई जाती हैं।
इसी किचन गार्डन की सब्जियां स्कूल के मिड-डे मील में उपयोग की जाती हैं, जिससे बच्चों को ताजा और पौष्टिक भोजन मिलता है। इसके साथ ही, स्कूल परिसर में लगाए गए केले के पेड़ों के फल भी बच्चों को नियमित भोजन के साथ दिए जाते हैं।
अनुपयोगी जमीन को बनाया सीख और पोषण का साधन
प्रधानपाठक देवी सिंह मरकाम बताते हैं कि पहले स्कूल की जमीन बारिश में पानी भरने के कारण उपयोग में नहीं आती थी। उन्होंने कहा, “हमने सोचा क्यों न इसे खेती के लिए इस्तेमाल किया जाए। आज यही जमीन बच्चों की पढ़ाई, पोषण और सीख का आधार बन गई है।”
उनके अनुसार, इस पहल ने न केवल बेकार पड़ी जमीन को उपयोगी बनाया, बल्कि बच्चों में जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता की भावना भी जगाई।
फसल की आमदनी से बच्चों का विकास
संकुल समन्वयक गजाधर पांडे बताते हैं कि इस पहल में पालकों का भी पूरा सहयोग मिलता है। वे कहते हैं, “बच्चे परंपरागत खेती के साथ आधुनिक तकनीक भी सीख रहे हैं। फसल से आने वाली राशि बच्चों के अध्ययन टूर, शिक्षण सामग्री और जरूरतमंद छात्रों की सहायता पर खर्च की जाती है।”
यह मॉडल बच्चों को खेती के वैज्ञानिक तरीके समझने के साथ-साथ जीवन कौशल भी सिखाता है।
14 हजार की फसल से खरीदा गया प्रिंटर, इस वर्ष भी भरपूर उपज
पिछले साल स्कूल ने लगभग 14,000 रुपये का धान बेचा था। इस राशि से स्कूल ने एक प्रिंटर खरीदा, जिससे शिक्षण गतिविधियों में सुधार आया। इस वर्ष फसल और बेहतर हुई है, और व्यापारी स्वयं स्कूल में आकर धान खरीद रहे हैं। इससे बच्चों को मेहनत का सीधा मूल्य भी मिल रहा है।
अभिभावकों, शिक्षकों और छात्रों के चेहरे पर मुस्कान इस बात का प्रमाण है कि यह प्रयोग सफल और प्रेरणादायक है।
आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम
स्कूल में किए जा रहे इस अनोखे प्रयोग ने खेती को शिक्षा का हिस्सा बना दिया है। बच्चे यहां न केवल खेती के गुर सीख रहे हैं, बल्कि टीमवर्क, अनुशासन, दक्षता और जिम्मेदारी जैसे जीवन मूल्यों को भी समझ रहे हैं।
जहां खेत कक्षा बन जाएं और फसलें किताबों की तरह सीख दें, वहां के बच्चे सिर्फ पढ़े-लिखे नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और संवेदनशील नागरिक बनकर उभरते हैं। यह मॉडल देश के अन्य ग्रामीण स्कूलों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।




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