
भारत के किसान आज ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहां संकट और अवसर दोनों हैं। चुनौतियां गंभीर हैं- गिरता भूजल स्तर, अनियमितमानसून, घटती जोत के साथ अनुसंधान प्रयोगशालाओं और किसानी की असलियत के बीच बढ़ता फसला। हालांकि, इन्हीं चुनौतियों वाली धरती में एक क्रांति का बीज भी निहित है, जो न केवल ट्रैक्टरों और ट्यूबवेलों से, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता से संचालित है। यहां यह भी देखा जा सकता है कि तकनीक कैसे शहरी शासन से लेकर स्वास्थ्य सेवा तक, रोजमर्रा की प्रणालियों को नया रूप दे सकती है।
ऐसी ही एक तकनीक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) में उस चीज को आगे बढ़ाने की क्षमता है, जिसे भारत की ‘बुद्धि क्रांति’ कहा जा सकता है। तीसरी हरित क्रांति, जो डिजिटल, डाटा-संचालित और पूरी तरह से मानवीय है। इसे जमीन पर उतारने के लिए हरियाणा में मेवात के किसान की कल्पना कर सकते हैं। उसके खेत में सेंसरों का एक छोटा सा नेटवर्क खामोशी से मिट्टी की नमी के स्तर को मापता है। इस डाटा का मृदा स्वास्थ्य रिकॉर्ड, स्थानीयमौसम पूर्वानुमान और फसल की वृद्धि अवस्था के साथ क्रॉस- रेफरेंस किया जाता है। कुछ ही सेकंड में किसानको फोन पर एक संदेश प्राप्त होता है, ‘आज एक घंटे के लिए अपना पंप चलाएं।’ एआई का यह सरल प्रयास हजारों लीटर पानी बचाता है, बिजली की खपत कम करता है और मिट्टी की उर्वरता की रक्षा करता है ।
किसान हमेशा से प्राकृतिक वैज्ञानिक रहे हैं। मिट्टी की बनावट, मानसून के पैटर्न और कीटों के व्यवहार का अवलोकन वे अपने अनुभव से करते रहे हैं। एआई जब किसान के जीवंत ज्ञान के साथ मिलता है, तो वह ‘संवर्धित कृषि’ का रूप ले लेता है। वॉयस और चैट जैसे एआई टूल्स द्वारा संचालित क्षेत्रीय भाषाओं में सलाहकार सेवाएं पहले से सक्रिय हैं। किसान अब अपनी भाषा में प्रश्न पूछ सकते हैं और तुरंत वैज्ञानिक उत्तर प्राप्त कर सकते हैं। भारत को एक एकीकृत ढांचे की आवश्यकता है- एक डिजिटल सार्वजनिक संरचना, जो प्रत्येक किसान, खेत और वैज्ञानिकको जोड़े। यह ‘मिशन कृषि- ज्ञान’ है, जो तीसरी हरित क्रांति को शक्ति प्रदान करने के लिए डिजाइन की गई राष्ट्रीय कृषि-बुद्धिमत्ता है। जिस तरह यूपीआई ने भारत के वित्तीय समावेशन को बदल दिया, उसी तरह कृषि – ज्ञान कृषि को बदल सकता है।
इसी कड़ी में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के उस एकल, खुले प्लेटफॉर्म की कल्पना करें, जो उपग्रह डाटा, आईओटी सेंसर (एक उपकरण, जो अपने आसपास से डाटा एकत्र करता है और इसे अन्य उपकरणों या प्रणालियों को भेजता है), मृदा स्वास्थ्य सूचना और एआई विश्लेषण को एकीकृत करता हो और जो छोटे से छोटे किसान से लेकर बड़े शोध संस्थान तक हर हितधारक के लिए सुलभ हो ।
इस दृष्टिकोण का मूल उद्देश्य प्रत्येक क्लस्टर में एक ‘ग्राम वैज्ञानिक’ या फसल चिकित्सक तैयार करना है । ये डिजिटल रूप से प्रशिक्षित कृषि स्नातक एआई का चेहरा बनेंगे। ये डाटा जुटाएंगे, किसानों का मार्गदर्शन करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि तकनीक हर किसान तक पहुंचे। इस मॉडल से एक साथ कई उद्देश्य पाए जा सकते हैं। जैसे, सटीक मार्गदर्शन और प्रीमियम बाजार तक पहुंचने से किसानों की आय दोगुनी हो सकती है, कृषि स्नातकों को ग्रामीण नौकरियां मिल सकती हैं, राष्ट्रीयकृषि- बुद्धि ग्रिड का निर्माण हो सकता है, समय पर योजनाओं के क्रियान्वयन, पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार हो सकते हैं। जब यह पारिस्थितिकी तंत्र काम करना शुरू करेगा, तो शक्तिशाली, आत्म- सुदृढ़ चक्र शुरू होगा।
एआई का प्रभाव भंडारण और रसद से लेकर बाजार की जानकारी और मूल्य निर्धारण तक है। उदाहरण के लिए, चित्र पहचान और निकट अवरक्त स्पेक्ट्रोस्कोपी (एनआईआर) उपकरण किसानों को स्वचालित रूप से उत्पादों का मूल्यांकन करने और संस्थागत खरीदारों या डिजिटल बाजारों से सीधे जुड़ने में मदद कर सकते हैं। शहरी खुदरा क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता संचालित मूल्य निर्धारण प्रणालियां फलों और सब्जियों की कीमतों को समायोजित करती हैं । इस तरह यह एक ऐसी तकनीक है. जिसे मंडियों में अपव्यय को कम करने और निष्पक्षता में सुधार के लिए उपयोग किया जा सकता है।




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