
भारत की उच्च शिक्षा लंबे समय तक एक ही मॉडल पर चलती रही है—सेमेस्टर के अंत में तीन घंटे की लिखित परीक्षा। यही एक पेपर तय करता था कि छात्र कितना “सीखा” है। चाहे इंजीनियरिंग हो, कॉमर्स, लॉ या मैनेजमेंट—अधिकतर कॉलेजों में यही परंपरा चली आ रही थी।
कोविड-19 के दौरान जब कैंपस बंद हुए और परीक्षाएँ कराना मुश्किल हुआ, तब इस मॉडल की सीमाएँ साफ दिखाई देने लगीं। कई संस्थानों ने पाया कि उनके पास सीखने को मापने के विकल्प बहुत कम हैं। तब क्विज़, प्रोजेक्ट, ऑनलाइन प्रेज़ेंटेशन, ओपन-बुक टेस्ट जैसे कई प्रयोग शुरू हुए। शुरू में भले चुनौतियाँ आईं, लेकिन धीरे-धीरे यह समझ मजबूत हुई कि 21वीं सदी की ज़रूरतें सिर्फ़ एक परीक्षा से पूरी नहीं हो सकतीं—इसके लिए बहु-आकलन (Multi-Assessment) की संस्कृति ज़रूरी है।
बहु-आकलन का सरल अर्थ है—सीखने को अलग-अलग समय पर, अलग उद्देश्यों के साथ और अलग तरीकों से मापना। इसमें छात्र की शुरुआती तैयारी, सीखने की यात्रा और अंतिम प्रदर्शन—तीनों का संतुलित मूल्यांकन शामिल होता है।
“Assessment of Learning” से आगे बढ़कर “Assessment as Learning” तक
भारत में अभी भी अधिकांश सिस्टम का केंद्र है—assessment of learning, यानी कोर्स के अंत में दिए गए अंक। इससे बेहतर मॉडल है assessment for learning, जिसमें छोटे-छोटे टेस्ट और असाइनमेंट से छात्र को लगातार दिशा मिलती है।
लेकिन वैश्विक स्तर पर सबसे आधुनिक मॉडल है—assessment as learning, जहां आकलन भी सीखने का ही हिस्सा बन जाता है। इसमें:
– छात्र मूल्यांकन के मानदंड समझते हैं
– वे स्वयं अपना और साथियों का काम जाँचते हैं
– फीडबैक देखकर अपनी कमियों पर खुद काम करते हैं
इससे मेटाकॉग्निशन यानी सोचने की क्षमता बढ़ती है। छात्र सिर्फ़ यह नहीं पूछते कि “कितने नंबर मिले?”, बल्कि यह समझते हैं कि “मैंने क्या सीखा, कहाँ कमी रह गई?कहाँ सुधार की ज़रूरत है?”
भारत जैसे विविध पृष्ठभूमि वाले देश में यह मॉडल विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि यह हर छात्र को खुद को साबित करने के कई मौके देता है।
डायग्नोस्टिक, फ़ॉर्मेटिव और समेटिव—आकलन की तीन-स्तरीय यात्रा
अच्छा बहु-आकलन किसी भी काम का ढेर नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित ढांचा है:
- डायग्नोस्टिक आकलन—शुरुआत का पता लगाने के लिए
उदाहरण:
– इंजीनियरिंग में मेकैनिक्स से पहले बेसिक क्विज़
– MBA छात्रों का क्वांट और लेखन टेस्ट
– B.Ed छात्रों का “अच्छा शिक्षक कौन?” पर छोटा निबंध
इसका उद्देश्य सिर्फ़ समझ बनाना है, अंक देना नहीं।
- फ़ॉर्मेटिव आकलन—सीखते हुए मार्गदर्शन
यह पूरे सेमेस्टर चलता है।
उदाहरण:
– मेडिकल में ऑनलाइन केस क्विज़
– लॉ में जजमेंट-बेस्ड केस ब्रीफ
– मीडिया में डॉक्यूमेंट्री के रफ़ कट
– डिज़ाइन में स्टूडियो क्रिट
इससे निरंतर सीखने की आदत बनती है और आख़िरी परीक्षा का दबाव कम होता है।
- समेटिव आकलन—अंतिम लेकिन वास्तविक जीवन से जुड़ा मूल्यांकन
केंद्र में होता है असली काम:
– इंजीनियरिंग में कैपस्टोन प्रोजेक्ट
– मैनेजमेंट में MSME कंसल्टिंग
– शिक्षक-प्रशिक्षुओं का टीचिंग पोर्टफोलियो
– लॉ में मूट कोर्ट और लीगल क्लिनिक
– मीडिया/डिज़ाइन में इंडस्ट्री-रिव्यूड पोर्टफोलियो
यहाँ ज्ञान के साथ टीमवर्क, समस्या-समाधान और नैतिकता भी आंकी जाती है।
बहु-आकलन की प्रमुख विधियाँ—फायदे और चुनौतियाँ
- प्रदर्शन-आधारित आकलन
(OSCE, मूट कोर्ट, लाइव इवेंट आदि)
फायदा: असली कौशल का परीक्षण
चुनौती: समय और योजना की ज़रूरत
- पोर्टफोलियो / ई-पोर्टफोलियो
फायदा: विकास की पूरी यात्रा दिखती है
चुनौती: निष्पक्ष मूल्यांकन के लिए स्पष्ट रूब्रिक चाहिए
- जांच-आधारित आकलन
(फील्ड स्टडी, रिसर्च, केस स्टडी)
फायदा: जिज्ञासा और स्थानीय मुद्दों से जुड़ाव
चुनौती: कॉपी-पेस्ट का खतरा
- सहयोगी और सहपाठी आकलन
फायदा: टीमवर्क और नेतृत्व का विकास
चुनौती: ईमानदार फीडबैक देने में हिचक
- प्रतिबिंबात्मक आकलन
फायदा: छात्र अपनी सीख को समझते हैं
चुनौती: कई छात्रों को यह नया और मुश्किल लगता है
भारत में बदलता परिदृश्य—कुछ प्रमुख उदाहरण
मुंबई विश्वविद्यालय: 60:40 पैटर्न—60% फाइनल एग्ज़ाम, 40% इंटरनल
दिल्ली विश्वविद्यालय: UGCF 2022 में 25% इंटरनल असेसमेंट
JNU: लंबे समय से सेमिनार, टर्म पेपर और क्लास भागीदारी आधारित मूल्यांकन
मेडिकल कॉलेज: OSCE/vOSCE का बढ़ता इस्तेमाल
इंजीनियरिंग: Outcome-Based Education के तहत प्रोजेक्ट-बेस्ड लर्निंग
लॉ संस्थान: मूट कोर्ट, लीगल एड क्लिनिक और सिम्युलेटेड केसवर्क
मीडिया/डिज़ाइन स्कूल: पोर्टफोलियो, लाइव कैंपेन और स्टूडियो क्रिट
टेक्नोलॉजी, समानता और AI के दौर में नई ज़रूरतें
रिपोर्ट्स साफ़ कहती हैं कि आकलन तटस्थ नहीं होता।
बहु-आकलन के माध्यम से संस्थान:
– कई तरीकों की अभिव्यक्ति खोलते हैं
– प्रगति पर जोर देते हैं
– पारदर्शी रूब्रिक साझा करते हैं
– आत्म-आकलन को बढ़ावा देते हैं
लेकिन दो बड़ी चुनौतियाँ हैं:
- डिजिटल डिवाइड
सभी छात्रों के पास डिवाइस नहीं, इसलिए लो-बैंडविड्थ और ऑफ़लाइन विकल्प आवश्यक हैं।
- जनरेटिव AI
ChatGPT जैसी तकनीकें सामान्य निबंध और याददाश्त वाले टेस्ट आसानी से हल कर देती हैं।
इसलिए अब ज़रूरत है—
– मौखिक प्रदर्शन
– स्थानीय संदर्भ
– वास्तविक अनुभव
– लाइव प्रोजेक्ट
– चिंतन-आधारित आकलन
ऐसे कार्यों की जिन्हें AI से कॉपी नहीं किया जा सकता।
आगे की राह—नीति और ज़मीनी सुधार
भारतीय विश्वविद्यालयों के सामने बड़े बैच, सीमित फैकल्टी और प्रशासनिक दबाव जैसी चुनौतियाँ हैं। ऐसे में चरणबद्ध रणनीति आवश्यक है:
– NEP 2020 के अनुरूप स्पष्ट आकलन नीति
– फैकल्टी विकास कार्यक्रम और पीयर-रीव्यू संस्कृति
– LMS, Samarth, e-portfolio जैसे डिजिटल टूल
– छात्र फीडबैक के आधार पर वर्कलोड संतुलन
– NAAC/NBA में वास्तविक सीख और रोजगार-परिणामों को प्राथमिकता
एक बड़ी परीक्षा से आगे—सीख की रंगीन मोज़ेक तक
बहु-आकलन का मतलब काम बढ़ाना नहीं, बल्कि सोच-समझकर बनाए गए ऐसे मूल्यांकन हैं जो:
– सीखने को निरंतर बनाते हैं
– हर छात्र के लिए न्यायसंगत अवसर खोलते हैं
– असली कौशल को पहचानते हैं
– बेहतर शिक्षक-छात्र संवाद बनाते हैं
NEP 2020, डिजिटल बदलाव और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में यह भारतीय उच्च शिक्षा के लिए एक रणनीतिक अवसर है—ऐसे ग्रेजुएट तैयार करने का जो आत्मविश्वासी हों, कुशल हों और वास्तविक दुनिया की चुनौतियों के लिए तैयार हों।
जब हम एक परीक्षा के ढांचे से आगे बढ़ते हैं, तो आकलन सीखने की यात्रा का जीवंत हिस्सा बन जाता है—जैसे एक सुंदर मोज़ेक जिसमें हर टाइल छात्र की बढ़ती क्षमता की कहानी कहती है। यही भारतीय विश्वविद्यालयों का अगला बड़ा कदम होना चाहिए।




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