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Gen Z Wants Results, Not Promises: India's Youth Demand Jobs, Trust and Accountability

जेन-जी का सब्र जवाब दे रहा है: अब युवाओं को वादे नहीं, परिणाम चाहिए

Gen Z Wants Results, Not Promises: India's Youth Demand Jobs, Trust and Accountability

भारत की राजनीति में युवा हमेशा एक महत्वपूर्ण शक्ति रहे हैं, लेकिन आज की जेन-जी (Gen Z) अपने पूर्ववर्ती पीढ़ियों से अलग है। यह पीढ़ी केवल भाषण नहीं सुनती, सवाल भी पूछती है। यह केवल वोट नहीं देती, बल्कि सोशल मीडिया, डिजिटल मंचों और सार्वजनिक बहसों के जरिए सत्ता से जवाब भी मांगती है। हाल के पेपर लीक विवादों और भर्ती परीक्षाओं को लेकर हुए देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों ने यह साफ कर दिया है कि युवाओं का धैर्य अब अपनी सीमा पर पहुंच रहा है।

पेपर लीक को केवल परीक्षा प्रणाली की तकनीकी खामी मानना वास्तविक समस्या को नजरअंदाज करना होगा। यह उस गहरे संकट का प्रतीक है, जो वर्षों से शिक्षा, रोजगार और शासन व्यवस्था में जमा हो रहा है। जब कोई परीक्षा रद्द होती है, तो केवल एक प्रश्नपत्र नहीं लीक होता, बल्कि उस व्यवस्था पर से भरोसा भी टूटता है, जिसके सहारे लाखों युवा अपना भविष्य बनाना चाहते हैं।

भारत का मध्यमवर्ग शिक्षा को सामाजिक और आर्थिक उन्नति का सबसे बड़ा साधन मानता है। परिवार अपनी जमा पूंजी बच्चों की पढ़ाई और कोचिंग पर खर्च करते हैं। कई छात्र वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। ऐसे में जब परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी होती है या भर्ती वर्षों तक अटक जाती है, तो इसका असर केवल अभ्यर्थी पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों पर पड़ता है।

युवाओं के गुस्से की जड़ें केवल परीक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। इसके पीछे रोजगार को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी है। उच्च शिक्षा में दाखिले बढ़े हैं, डिग्रियां बढ़ी हैं, लेकिन सम्मानजनक और स्थिर रोजगार की उपलब्धता उसी गति से नहीं बढ़ी। लाखों शिक्षित युवा आज भी ऐसी नौकरियों में काम करने को मजबूर हैं, जो उनकी योग्यता और क्षमता के अनुरूप नहीं हैं। सरकारी नौकरियों की ओर बढ़ता आकर्षण भी इसी असुरक्षा का परिणाम है।

दूसरी ओर, निजी शिक्षा का बढ़ता खर्च और रोजगार की अनिश्चितता परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ा रही है। विश्वविद्यालयों के चमकदार विज्ञापन और बड़े प्लेसमेंट पैकेजों की घोषणाएं अक्सर वास्तविक तस्वीर को छिपा देती हैं। अभिभावक फीस भरते समय भविष्य खरीदने का सपना देखते हैं, लेकिन डिग्री मिलने के बाद भी रोजगार की कोई गारंटी नहीं होती।

इस पूरी बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू गीग इकॉनमी भी है। लाखों युवा आज डिलीवरी, कैब सेवाओं और फ्रीलांस कार्यों के जरिए रोजगार तो पा रहे हैं, लेकिन उनके पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है। बीमारी, दुर्घटना या काम छिन जाने की स्थिति में उनके पास कोई मजबूत सुरक्षा कवच नहीं होता। रोजगार के बदलते स्वरूप के साथ नीतियों का बदलना भी उतना ही जरूरी है।

इस बीच सोशल मीडिया ने युवाओं को नई ताकत दी है। अब किसी समस्या को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने के लिए बड़े मंचों या राजनीतिक संगठनों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। एक वीडियो, एक पोस्ट या एक अभियान लाखों लोगों को जोड़ सकता है। यही वजह है कि आज का युवा केवल संदेश प्राप्त करने वाला नहीं, बल्कि अपनी बात कहने वाला सक्रिय नागरिक बन चुका है।

लेकिन राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ा संदेश यह है कि बेहतर डिजिटल संवाद, बेहतर शासन का विकल्प नहीं हो सकता। आकर्षक वीडियो, प्रभावशाली अभियान और सोशल मीडिया रणनीतियां युवाओं तक पहुंच तो बना सकती हैं, लेकिन वे रोजगार नहीं दे सकतीं, परीक्षा व्यवस्था को पारदर्शी नहीं बना सकतीं और न ही टूटे भरोसे को अपने आप जोड़ सकती हैं।

2029 का लोकसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसके संकेत आज दिखाई देने लगे हैं। युवा मतदाता केवल पहचान की राजनीति से संतुष्ट नहीं होगा। वह जाति, धर्म और सांस्कृतिक मुद्दों के साथ-साथ रोजगार, शिक्षा, अवसर और जवाबदेही पर भी सवाल पूछेगा। वह सरकार से भी जवाब मांगेगा और विपक्ष से भी। उसके लिए सत्ता और विपक्ष दोनों की परीक्षा समान रूप से महत्वपूर्ण होगी।

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। लेकिन यही ताकत तब चुनौती बन सकती है जब आकांक्षाओं और अवसरों के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जाए। युवाओं को भाषण नहीं, भरोसा चाहिए। घोषणाएं नहीं, नियुक्तियां चाहिए। वादे नहीं, परिणाम चाहिए।

यदि देश की राजनीति इस संदेश को समय रहते समझ लेती है, तो यह असंतोष बदलाव की ऊर्जा बन सकता है। लेकिन यदि इसे केवल सोशल मीडिया की क्षणिक नाराजगी समझकर नजरअंदाज किया गया, तो आने वाले वर्षों में यही बेचैनी भारत की राजनीति और शासन व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी होगी।

आज का युवा इंतजार कर रहा है, लेकिन हमेशा के लिए नहीं। उसकी मांग सरल है—मेहनत का सम्मान, अवसर की निष्पक्षता और भविष्य की निश्चितता। लोकतंत्र की असली परीक्षा भी अब इसी कसौटी पर होने वाली है।

 

 

रईस अहमद 'लाली'

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