
यूरोप और उत्तर अमेरिका में सार्वजनिक चर्चा में अभी तक चीन के वैश्विक विज्ञान पर बढ़ते प्रभाव को पूरी तरह मान्यता नहीं मिली है, लेकिन स्वीडिश फाउंडेशन फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन इन रिसर्च एंड हायर एजुकेशन (STINT) की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन आज विज्ञान की दुनिया को गहराई से प्रभावित कर रहा है और इसका भविष्य के शोध सहयोग और नीतियों पर बड़ा असर पड़ेगा।
यह रिपोर्ट डॉ. एरिक फोर्सबर्ग द्वारा तैयार की गई है, जो 2018 से चीन और आसियान के लिए STINT प्रतिनिधि हैं। रिपोर्ट Internationalisation Outlook No. 4, 2025 में दुनिया की प्रमुख शोध विश्वविद्यालयों की एक अलग तस्वीर सामने रखी गई है। यह मुख्यधारा की रैंकिंग से इसलिए अलग है क्योंकि यह कई सूचकांकों पर ध्यान देने की बजाय केवल शोध क्षमता पर केंद्रित है।
फोर्सबर्ग कहते हैं, “अगर हमें सिर्फ शोध क्षमता के आधार पर विश्वविद्यालयों को रैंक करना है, तो हमें एक वैकल्पिक तरीका अपनाना होगा। सबसे मजबूत शोध संस्थानों की रैंकिंग उनके शोध की गुणवत्ता और मात्रा दोनों पर आधारित होनी चाहिए।”
उन्होंने नीदरलैंड्स की लीडन यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित CWTS Leiden Rankings के डेटा का उपयोग करते हुए विश्वविद्यालयों को छह तालिकाओं में उनकी अत्यधिक उद्धृत शोध प्रकाशनों की संख्या के आधार पर रैंक किया है।
चीन की वैज्ञानिक प्रगति में बड़ी छलांग
रिपोर्ट से पता चलता है कि सहस्राब्दी के बाद चीन ने विज्ञान, विशेषकर गणित, कंप्यूटिंग और इंजीनियरिंग के क्षेत्रों में असाधारण प्रगति की है।
फोर्सबर्ग ने कहा, “पिछले दो दशकों में चीन की अकादमिक दुनिया में काम करते हुए मैंने जिन बदलावों को देखा है, वे आज कई लोगों के लिए चौंकाने वाले साबित हो रहे हैं। यूरोप और उत्तरी अमेरिका में नीति निर्माताओं ने चीन की वास्तविक वैज्ञानिक क्षमता पर उतना ध्यान नहीं दिया, जितना देना चाहिए था। इसी वजह से कई नीतियां पुरानी धारणाओं पर आधारित हैं, जो गलत फैसलों का कारण बन सकती हैं। इस रिपोर्ट का उद्देश्य शोध प्रभाव (research impact) को अलग करके वैश्विक वैज्ञानिक परिदृश्य की वास्तविक तस्वीर दिखाना है।”
रिपोर्ट में वे लिखते हैं, “एक दशक पहले अमेरिका और यूरोप का वैज्ञानिक वर्चस्व लगभग निर्विवाद था। लेकिन पिछले दशक में बड़ी बदलाव आया है—चीन विज्ञान के क्षेत्र में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा है।”
स्वीडिश रिसर्च काउंसिल की पूर्व अध्यक्ष एगनेटा ब्लाध ने कहा, “कठिन विज्ञान के क्षेत्रों में अग्रणी शोध का संतुलन तेजी से चीन की ओर शिफ्ट हो रहा है।”
उन्होंने चेतावनी दी कि चीन के साथ सहयोग से दूरी बनाना लंबे समय में विश्वविद्यालयों के लिए समस्याएं पैदा कर सकता है।
डेटा टेबल्स में दिखा स्पष्ट बदलाव
रिपोर्ट में विभिन्न समयावधियों की तुलना करने वाली छह तालिकाएँ शामिल हैं।
2009-2012 बनाम 2019-2020 की तुलना:
पहली तालिका में सभी विज्ञान क्षेत्रों में शीर्ष 10% सबसे अधिक उद्धृत प्रकाशनों वाली विश्व की शीर्ष 20 विश्वविद्यालयों की सूची दी गई है। 2009-2012 में इसमें एक भी चीनी विश्वविद्यालय नहीं था।
10 साल बाद, 12 चीनी विश्वविद्यालय शीर्ष 20 में शामिल हो गए, जिनमें शीर्ष पाँच में से चार चीन के थे—झेजियांग यूनिवर्सिटी, शंघाई जियाओतोंग यूनिवर्सिटी, त्सिंगहुआ यूनिवर्सिटी, और हुआझोंग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी।
बायोमेडिकल और हेल्थ साइंस:
यहां बदलाव कम है, लेकिन 2019-2022 में 7 चीनी विश्वविद्यालय शीर्ष 20 में हैं। 2009-2012 में इनमें से कोई भी सूची में नहीं था।
गणित, कंप्यूटर साइंस, फिजिकल साइंस और इंजीनियरिंग:
यहां बदलाव अत्यधिक है। गणित और कंप्यूटर साइंस में चीनी विश्वविद्यालयों की संख्या 5 से बढ़कर 19 हो गई। फिजिकल साइंस और इंजीनियरिंग में 2 से बढ़कर 19 हो गई। 2019-2022 में शीर्ष 20 में सिर्फ एक गैर-चीनी विश्वविद्यालय MIT था।
सामाजिक विज्ञान और मानविकी में चीन अब भी पीछे
सामाजिक विज्ञान और मानविकी में 2009-2012 और 2019-2022—दोनों समयावधियों में चीन किसी भी सूची में शीर्ष स्थानों पर नहीं है। इसका कारण सीमित फंडिंग और राजनीतिक-वैचारिक प्रतिबंध बताए गए हैं। यहां अमेरिकी और ब्रिटिश विश्वविद्यालयों का दबदबा बना हुआ है।
Nature Index से भी चीन की बढ़त की पुष्टि
Nature Index (2014 बनाम 2024) के डेटा में भी यही रुझान दिखता है:
– 2024 में शीर्ष 5 में से 4 संस्थान चीनी थे (हार्वर्ड यूनिवर्सिटी दूसरे स्थान पर)।
– 2024 की शीर्ष 20 में 13 चीनी संस्थान थे।
– 2014 में केवल एक—Chinese Academy of Sciences—पहले स्थान पर थी।
ASPI का विश्लेषण: 64 में से 57 तकनीकों में चीन नंबर 1
ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ASPI) के Critical Technology Tracker के अनुसार:
– 2019-2023 की अवधि में 64 में से 57 तकनीकों में चीन अग्रणी है।
– अमेरिका केवल बाकी 7 में आगे है।
– 2003-2007 में चीन केवल 3 तकनीकों में आगे था, जबकि अमेरिका 60 में।
– 2024 में 24 तकनीकी क्षेत्रों में चीन के “मोनोपॉली जोखिम” की स्थिति पाई गई।
ASPI के अनुसार, “चीन और अमेरिका की स्थिति अब लगभग उलट चुकी है।”
वैश्विक सहयोग पर बहस जारी
ओस्लो यूनिवर्सिटी और करोलिंस्का इंस्टीट्यूट के पूर्व रेक्टर ओले पीटर ओटर्सन ने कहा कि चीन के साथ सहयोग कम करना आसान निर्णय नहीं था, लेकिन पारदर्शिता की कमी और ज्ञान के दुरुपयोग के जोखिम को देखते हुए यह आवश्यक था।
उन्होंने कहा, “विज्ञान वैश्विक सहयोग पर आधारित है। अगर हम संबंध पूरी तरह समाप्त कर दें, तो वैश्विक समस्याओं का समाधान कठिन हो जाएगा।”
स्वीडिश विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि स्वीडन जैसे देशों के लिए सहयोग आवश्यक है क्योंकि वैश्विक शोध में उनका हिस्सा बहुत कम है। लेकिन चीन में राजनीतिक हस्तक्षेप, निगरानी और दोहरे उपयोग (dual-use) तकनीकों का खतरा भी वास्तविक है। इसलिए सहयोग पर निर्णय कुल मिलाकर नहीं बल्कि हर मामले के अनुसार लेना होगा।
चीन का वैज्ञानिक प्रभुत्व भविष्य की वैश्विक नीतियों को बदलेगा
विशेषज्ञों ने कहा कि आने वाले समय में वैश्विक शोध सहयोग, तकनीकी नीति, सुरक्षा, और नवाचार के क्षेत्रों में चीन की भूमिका को समझना अत्यंत जरूरी होगा।
फोर्सबर्ग के अनुसार, “चीन के विज्ञान तंत्र और उसके राज्य-केंद्रित मॉडल को समझना आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में शामिल होगा।”




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