
बिहार के बेतिया स्थित गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज (GMC) में एमबीबीएस की पढ़ाई जिस तरह बिना पर्याप्त शिक्षकों के सहारे चल रही है, उसने चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं खड़ी कर दी हैं। 2013 में शुरू हुए इस कॉलेज से 2019 बैच के छात्र पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बनकर निकल चुके हैं, जबकि कई विभागों में एक भी प्रोफेसर या टीचिंग फैकल्टी मौजूद नहीं रही। फिलहाल कॉलेज में लगभग 600 छात्र पढ़ रहे हैं, जिनकी शिक्षा का बड़ा हिस्सा अधूरे स्टाफ पर निर्भर है।
21 विभाग, लेकिन आधे से ज्यादा खाली—क्लासरूम से ज्यादा कुर्सियाँ खाली
कॉलेज में कुल 127 फैकल्टी पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें से 88 पद खाली पड़े हैं। यानी सिर्फ 39 शिक्षकों के भरोसे पूरा मेडिकल कॉलेज चल रहा है। कई महत्वपूर्ण विभाग तो पूरी तरह “शून्य फैकल्टी” की स्थिति में हैं। इनमें नेत्र रोग विभाग, एफएमटी (Forensic Medicine), रेस्पिरेट्री और टीबी, स्किन एवं वीडी, डेंटल और मनोरोग विभाग शामिल हैं। इन विभागों में पिछले कई महीनों से न एक प्रोफेसर है, न सह-प्राध्यापक, न असिस्टेंट प्रोफेसर।
कॉलेज प्राचार्य डॉ. दिनेश कुमार भी मानते हैं कि टीचिंग स्टाफ की कमी है, लेकिन उनका कहना है कि “छात्रों की पढ़ाई बाधित न हो, इसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं।”
PG स्टूडेंट्स का विरोध: “चार महीने से किसी ने पढ़ाया तक नहीं”
नेत्र विभाग की स्थिति सबसे खराब बताई जा रही है। यहां चार महीने से एक भी शिक्षक नहीं है। PG छात्रों ने प्रिंसिपल को आवेदन देकर बताया कि सर्जिकल स्किल सिखाने वाला कोई नहीं, OPD और ऑपरेशन ठप है, मरीजों की परेशानी बढ़ी है और पढ़ाई अधर में है। ऐसी स्थिति में पोस्ट-ग्रेजुएट प्रशिक्षण का महत्व ही कम हो जाता है, जो भविष्य के विशेषज्ञ डॉक्टर तैयार करने के लिए बेहद जरूरी है।
विभागवार स्वीकृत व खाली पद
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विभाग |
स्वीकृत पद |
खाली पद |
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एनाटॉमी |
09 |
07 |
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फिजियोलॉजी |
09 |
06 |
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माइक्रोबायोलॉजी |
11 |
07 |
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मेडिसिन |
08 |
06 |
|
सर्जरी |
08 |
05 |
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एनेस्थिसिया |
07 |
05 |
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पीएसएम |
11 |
09 |
|
रेडियोलॉजी |
03 |
02 |
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ऑर्थोपेडिक्स |
04 |
02 |
इन आंकड़ों से साफ है कि कॉलेज में बुनियादी और क्लिनिकल दोनों विभाग एक साथ स्टाफ की भारी कमी झेल रहे हैं।
विशेषज्ञों ने उठाए गंभीर सवाल
1. डॉ. श्रीकांत दुबे
(सेवानिवृत्त सिविल सर्जन एवं पूर्व उपाधीक्षक, GMCH)
“पढ़ाई ठप है तो भविष्य खतरे में है। बिना सही ट्रेनिंग के निकले छात्र मरीजों का इलाज कैसे करेंगे? सरकार को जल्द नियुक्ति करनी चाहिए।”
2. डॉ. प्रमोद तिवारी
(पूर्व अधीक्षक, GMCH)
“टीचिंग स्टाफ की कमी से छात्रों की शिक्षा पर सीधा असर पड़ रहा है। आधा-अधूरा ज्ञान लेकर डॉक्टर बनना मरीजों के लिए जोखिम है। तत्काल विजिटिंग प्रोफेसर बुलाए जाने चाहिए।”
3. डॉ. किरण शंकर झा
(पूर्व जिला अध्यक्ष, IMA)
“प्रैक्टिकल ट्रेनिंग कमजोर होगी तो छात्र भविष्य में अपने करियर में संघर्ष करेंगे। यह चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर चोट है।”
स्वास्थ्य व्यवस्था पर खतरा: अधूरे ज्ञान के डॉक्टर—किसके लिए सुरक्षित?
मेडिकल कॉलेज सिर्फ डिग्री देने वाली संस्था नहीं होता; यह ऐसे डॉक्टर तैयार करता है जिन पर लाखों लोगों की जान और इलाज निर्भर करता है।
जब एमबीबीएस छात्र बिना प्रोफेसरों के पढ़ाई कर निकलेंगे:
– सर्जरी में आत्मविश्वास कम
– क्लिनिकल डायग्नोसिस कमजोर
– इमरजेंसी हैंडलिंग में दिक्कत
– जटिल बीमारियों का उपचार जोखिमपूर्ण
यह स्थिति न सिर्फ छात्रों के भविष्य, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए चिंता का विषय है।
यह सिर्फ कॉलेज की समस्या नहीं, चिकित्सा व्यवस्था की चेतावनी है
गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज की स्थिति बताती है कि मेडिकल शिक्षा में स्टाफ की कमी अब एक सामान्य मुद्दा बन चुका है। वर्षों से खाली पड़े पद सरकारी लापरवाही का संकेत देते हैं।
सरकार अगर तुरंत कदम नहीं उठाती तो पढ़ाई प्रभावित होगी, मरीजों की सुरक्षा खतरे में आएगी, आने वाले वर्षों में गुणवत्तापूर्ण डॉक्टरों की कमी और बढ़ेगी। चिकित्सा शिक्षा को लेकर कठोर नीति, समयबद्ध नियुक्तियां और विजिटिंग/गेस्ट फैकल्टी की तैनाती तत्काल की जरूरत है। क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं कि “कौन पढ़ाएगा?” बल्कि यह भी कि कल को बीमार पड़ने पर हमारा इलाज कौन करेगा?




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