
भारत में उच्च शिक्षा का GER अभी सिर्फ 28.4% है। NEP 2020 के 50% लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विश्वविद्यालयों को कौशल आधारित शिक्षा को डिग्री के साथ जोड़ना होगा, ताकि छात्रों को बेहतर रोजगार और अधिक प्रवेश दोनों मिल सकें।
– कनिष्का
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था इस समय बड़ी चुनौती के दौर से गुजर रही है। देश की आबादी दुनिया में सबसे अधिक है, लाखों युवा हर साल 12वीं पास कर रहे हैं, लेकिन फिर भी कॉलेज में प्रवेश लेने वालों की संख्या बहुत कम है। AISHE 2023-24 के नए आंकड़ों से पता चलता है कि 18 से 23 वर्ष की आयु के युवाओं का GER यानी Gross Enrollment Ratio केवल 28.4% है। यह संख्या चीन और ब्राज़ील जैसे देशों से काफी पीछे है। जबकि भारत ने NEP 2020 में स्पष्ट लक्ष्य तय किया है कि वर्ष 2035 तक यह GER 50% तक पहुंचना चाहिए।
समस्या यह है कि विश्वविद्यालयों में सिर्फ डिग्री आधारित शिक्षा मिलती है, जबकि वास्तविक दुनिया में युवा नौकरियों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज के समय में कंपनियां प्रमाणपत्र से अधिक कौशल देखती हैं। यही कारण है कि Vocational Education यानी कौशल आधारित शिक्षा को डिग्री कार्यक्रमों का हिस्सा बनाना अब सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों के अस्तित्व के लिए अनिवार्य हो गया है।
पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों ने मल्टीडिसिप्लिनरी स्ट्रक्चर को अपनाया है, लेकिन अधिकांश कॉलेज अभी भी पुरानी शिक्षा पद्धति से बाहर नहीं निकले। सिर्फ 10% कॉलेज ही ऐसे हैं जिन्होंने अपने पाठ्यक्रम में स्किल-आधारित क्रेडिट जोड़े हैं। यही वजह है कि अनेक विश्वविद्यालयों में सीटें खाली रह जाती हैं और रैंकिंग लगातार गिरती जा रही है।
भारत में 10वीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते 12.6% छात्र पढ़ाई छोड़ देते हैं। ग्रामीण परिवारों के युवाओं की प्राथमिकता जल्दी रोजगार पाना होती है, इसलिए अक्सर वे कॉलेज न जाकर कामधंधे में लग जाते हैं। अगर कॉलेज पढ़ाई के साथ काम सीखने और कमाने के अवसर दें, तो यही छात्र दोबारा शिक्षा की ओर लौट सकते हैं।
देश में पहले से ही Apprentice-Integrated Degree, Multiple Entry-Exit System, Online & Hybrid Learning और ABC Credit Bank जैसे महत्वपूर्ण सुधार लागू किए जा चुके हैं। अगर इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो लाखों युवा उच्च शिक्षा में वापस आ सकते हैं। उद्योगों के सहयोग से Skill Labs, Digital Training और रोजगार आधारित कोर्सेस से छात्रों को अधिक अवसर मिलेंगे और विश्वविद्यालयों को भी स्थिरता मिलेगी।
यह बदलाव न सिर्फ छात्रों के लिए फायदेमंद है, बल्कि विश्वविद्यालयों और देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ा कदम साबित होगा। अध्ययनों से पता चला है कि कौशल आधारित शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की आय पारंपरिक डिग्री वालों की तुलना में 20% अधिक होती है। वहीं ऐसे प्रोग्राम अपनाने वाले विश्वविद्यालयों में प्लेसमेंट और प्रवेश दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। भारत की अर्थव्यवस्था को भी लाखों कुशल युवाओं से बड़ी मजबूती मिलेगी।
सच यह है कि 2035 दूर नहीं। लक्ष्य बड़ा है, लेकिन सही दिशा मिले तो पूरी तरह संभव है। विश्वविद्यालयों को अब इंतजार नहीं करना चाहिए। डिग्री और स्किल को साथ जोड़कर ही वे अपनी सीटें भर पाएंगे, प्रतिष्ठा बनाए रखेंगे और देश के युवाओं को वास्तविक अवसर दे सकेंगे। आज का कदम भारत के भविष्य को बदल सकता है—एक ऐसे भविष्य की ओर, जहां हर युवा नौकरी के लिए तैयार और दुनिया से मुकाबला करने में सक्षम हो।




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