
देश में उच्च शिक्षा का विस्तार पिछले दशक में जितनी तेज़ी से हुआ है, उतनी ही तेज़ी से उसकी विश्वसनीयता भी सवालों में घिरती गई है। अल फलाह यूनिवर्सिटी का ताज़ा मामला इसी संकट का सबसे ख़तरनाक उदाहरण बनकर सामने आया है। दिल्ली में लाल किले के पास हुए धमाके की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, यह आशंका गहराती जा रही है कि हमारे विश्वविद्यालय आतंकी नेटवर्क के लिए सॉफ्ट टारगेट बनते जा रहे हैं—और हम समय रहते चेत नहीं पाए।
सबसे चिंता की बात यह है कि इस मामले में जिन पर शक है—डॉ. उमर नबी और उसके सहयोगी—वे कोई अनपढ़ या भोले-भाले लोग नहीं थे। वे उसी संस्थान में डॉक्टर की भूमिका निभा रहे थे, जिस पर समाज को शिक्षित और चिकित्सा सेवाओं में सहयोग देने की ज़िम्मेदारी थी। कल्पना कीजिए, जब ज्ञान के मंदिर के भीतर ही ऐसा षड्यंत्र पनपे, तो सुरक्षा एजेंसियों को कितना मुश्किल होगा दुश्मन को पहचानना।
इससे कहीं अधिक गंभीर आरोप वित्तीय अनियमितताओं के हैं। ईडी की जांच में सामने आए 415 करोड़ रुपये के लेन-देन यह साफ दिखाते हैं कि शिक्षा एक सेवा नहीं, बल्कि एक बड़े बिजनेस मॉडल में बदल चुकी है—जहाँ फीस वसूली को जायज़ ठहराने के लिए मान्यता, ग्रेड और नियमों को भी मनमाफिक मोड़ दिया जाता है। और सवाल यहाँ यही उठता है—ये खेल इतने लंबे समय तक चलता कैसे रहा?
यही वह खामी है जहाँ भारत की शिक्षा निगरानी प्रणाली कटघरे में खड़ी होती है। UGC, AICTE, NCTE… कागज़ों में ये संस्थाएँ मौजूद हैं, लेकिन उनकी निगरानी कितनी प्रभावी है? अगर यह यूनिवर्सिटी वर्षों तक बिना नवीनीकरण के मान्यता का दावा करती रही, तो नियामकों की जाँच-पड़ताल कहाँ सोई हुई थी?
यह कोई पहला मामला नहीं है। देश में 22 फर्जी विश्वविद्यालय खुलेआम चल रहे हैं। 10 दिल्ली में ही। यह आंकड़ा ही दर्शाता है कि सिस्टम में कितनी बड़ी सेंध लगी हुई है। निजी विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ रही है—यह स्वागतयोग्य है—पर क्या हमने यह सवाल कभी उठाया कि उनका ऑडिट, सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और शिक्षक-नियुक्ति की प्रक्रिया कौन और कैसे देख रहा है?
एक और पहलू है जो और भी भयावह है—आतंकवाद का बदलता स्वरूप। जब इंटरपोल और रैंड जैसी एजेंसियाँ यह चेतावनी देती हैं कि आधुनिक आतंकवाद तकनीकी दिमागों के सहारे खड़ा हो रहा है, तब यह समझना मुश्किल नहीं कि विश्वविद्यालय उनके लिए उपजाऊ ज़मीन क्यों बनते जा रहे हैं। छात्र, लैब्स, रिसर्च, इंटरनेट—सब कुछ मौजूद है, बस एक गलत विचारधारा की जरूरत पड़ती है।
सुप्रीम कोर्ट में दिए गए बयान—“जब बुद्धिजीवी आतंकी बनते हैं, तो वे कहीं ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं”—शायद इस दौर का सबसे कड़वा सच है।
तो क्या समाधान है? जवाब बेहद स्पष्ट है—जवाबदेही और निगरानी। शिक्षा संस्थानों का विस्तार ज़रूरी है, लेकिन उस विस्तार में सुरक्षा का तत्व गायब नहीं होना चाहिए। न सिर्फ वित्तीय जांच, बल्कि मानव संसाधन और नेटवर्क वैरीफिकेशन भी कठोर हो। विश्वविद्यालयों को सिर्फ डिग्री फैक्ट्री नहीं—राष्ट्रीय सुरक्षा के संवेदनशील केंद्रों की तरह देखा जाए।
क्योंकि अगर संस्थान सशक्त न हों, तो ज्ञान आतंक से हार सकता है। और यह हार सिर्फ शिक्षा की नहीं—राष्ट्र की होगी।




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