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भारतीय ज्ञान परंपरा दे सकती है आधुनिक शिक्षा को नई दिशा, बोले प. बंगाल के शिक्षा मंत्री ब्रत्य बसु   

India's Ancient Intellectual Heritage Can Give Meaningful Direction to Modern Education, Says Bratya Basu

पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री ब्रत्य बसु का कहना है कि भारत की प्राचीन बौद्धिक विरासत आधुनिक शिक्षा को सार्थक दिशा दे सकती है। उनके अनुसार, आज समस्या ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि उसके सही समन्वय की है। श्री बसु ने एडइनबॉक्स (EdInbox) से एक खास बातचीत में उक्त विचार व्यक्त किये।  

भारतीय ज्ञान परंपरा (Indian Knowledge System – IKS) की प्रासंगिकता और पुनरुत्थान पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि “हमें आधुनिक विज्ञान को वैश्विक मानकों पर समझना ज़रूरी है। साथ ही छात्रों को न्यूटन और आर्यभट्ट, मॉलेक्यूलर बायोलॉजी और सुश्रुत, गवर्नेंस और कौटिल्य— इन सबको प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक विचारों की तरह सीखना चाहिए।”

शिक्षा मंत्री ने माना कि IKS हाल के वर्षों में राजनीतिक बहस का विषय बन गया है, लेकिन उन्होंने कहा कि ज्ञान को विचारधाराओं की सीमाओं से ऊपर होना चाहिए। श्री बसु ने कहा- “एक ऐसी सभ्यता जिसने पश्चिमी दुनिया से सदियों पहले वैज्ञानिक उपलब्धियाँ हासिल कीं, उसे शैक्षणिक मान्यता मिलनी ही चाहिए।”

हालाँकि उन्होंने चेतावनी दी कि “यह पुनरुत्थान शोध-आधारित, प्रमाणिक और इतिहाससम्मत होना चाहिए, गंभीर शिक्षा सुधार में रूमानी कल्पनाओं के लिए कोई जगह नहीं।”

उन्होंने IKS के लिए पीयर-रिव्यू शोध, प्राचीन ग्रंथों के बहुभाषी अनुवाद और प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। बसु ने कहा कि विश्वविद्यालयों को भारतीय ज्ञान प्रणाली को ऐच्छिक विषय की तरह नहीं, बल्कि शोध व नवाचार को मजबूत करने वाले ज्ञान स्रोत की तरह अपनाना होगा। बंगाल के पुनर्जागरण और वैज्ञानिक नेतृत्व की विरासत को देखते हुए उन्होंने कहा कि राज्य IKS आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने बताया कि छात्रों की प्रतिक्रिया तब अधिक सकारात्मक होती है जब IKS को व्यावहारिक उदाहरणों के साथ पढ़ाया जाता है, जैसे- प्राचीन जल प्रबंधन तकनीकें, संगीत में गणित, पारंपरिक वास्तुकला, पर्यावरण संरक्षण ज्ञान और भारतीय तर्क प्रणालियाँ। उन्होंने कहा कि शिक्षा को छात्रों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि भारत वैश्विक ज्ञान में योगदानकर्ता रहा है – न कि केवल एक उपभोक्ता।

वैश्विक दृष्टिकोण पर उन्होंने कहा- “दुनिया विविध ज्ञान प्रणालियों की तलाश में है। योग, आयुर्वेद, शास्त्रीय साहित्य— पहले ही वैश्विक पहचान पा चुके हैं। अब हमारी वैज्ञानिक और दार्शनिक परंपराओं को भी अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक मान्यता मिलनी चाहिए।”

अंत में उन्होंने कहा कि “भारतीय ज्ञान परंपरा अतीत में लौटने का आग्रह नहीं है। यह हमारे आत्मविश्वास और प्रगति की दिशा है। यदि इसे बुद्धिमानी से शिक्षा में अपनाया जाए, तो भारत का शिक्षा तंत्र आधुनिक, जड़ों से जुड़ा और विश्व में सम्मानित बन सकता है।”

 

एडइनबॉक्स टीम

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