
–रईस अहमद ‘लाली’
12 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने 2006 के निठारी कांड से जुड़े अंतिम 16वें मामले में सुरेंद्र कोली को बरी कर दिया। 29 दिसंबर 2006 को नोएडा के निठारी में कारोबारी मोहिंदर सिंह पंधेर के घर के पीछे नाले से कई बच्चों के कंकाल मिले थे। उनकी रिहाई के बाद बनी खामोशी एक गहरी असहजता को दर्शाती है — इसलिए नहीं कि उनकी बेगुनाही बिल्कुल स्पष्ट तौर पर साबित हो गई, बल्कि इसलिए कि जांच के दौरान जुटाए गए सबूत या तो दूषित थे या अधूरे।
दोहरी अन्याय की स्थिति
यह समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब हम याद करते हैं कि जिस घर में कथित घटनाएं हुईं, उसके मालिक मोहिंदर सिंह पंधेर को वर्षों पहले ही 14 साल की हिरासत के बाद बरी कर दिया गया था। इतनी गंभीर घटनाओं के दोनों आरोपियों का केवल इसलिए छूट जाना कि जांच कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतरी— किसी निष्पक्ष बरी होने का संकेत नहीं है। यह अभियोजन (Prosecution) की नाकामी है। यह स्थिति आरोपियों और पीड़ितों— दोनों के लिए दोहरा अन्याय है।
निठारी मामले में गलत आरोप और कमजोर जांच ने आरोपियों को भी पीड़ित बना दिया। कोली ने 19 साल जेल में बिताए और पंधेर ने 14 साल गंवाए। ये साल उनकी जिंदगी से बिना कारण मिटा दिए गए। भारत में अब भी कोई ऐसा स्पष्ट कानून नहीं है जो गलत तरीके से जेल में डाल दिए गए व्यक्तियों को मुआवज़ा दे सके। एक बार किसी को सीरियल किलर या बलात्कारी कह दिया जाए, तो बरी होने के बाद भी उसकी इज्जत वापस नहीं आती।
यह समस्या अकेली नहीं है। UAPA जैसे कड़े कानूनों के तहत कई लोग 10 साल या उससे ज्यादा जेल में बिताने के बाद सिर्फ तकनीकी आधार पर बरी हो जाते हैं। कानून आयोग की 277वीं रिपोर्ट ने ऐसे मामलों में मुआवज़ा देने की सिफारिश की थी, लेकिन यह प्रस्ताव अब भी लागू नहीं हो पाया है।
पीड़ितों के लिए न्याय का पूरा अभाव
इस अन्याय का दूसरा पहलू और भी भयावह है — पीड़ितों को न्याय न मिलना। निठारी के परिवार सच, जवाबदेही और संतोष के हकदार थे। लेकिन उन्हें मिला सिर्फ सन्नाटा।सबसे चिंताजनक बात यह है कि न तो ताज़ा जांच का आदेश दिया गया, न स्वतंत्र जांच एजेंसी की नियुक्ति हुई। ऐसा लगता है जैसे आरोपियों के बरी होते ही सिस्टम अपना काम समाप्त मान लेता है।
इसी तरह की एक घटना में अनुखीलाल, जिन्हें नाबालिग से बलात्कार के आरोप में दोषी ठहराया गया था, 11 साल जेल में रहने के बाद इसलिए बरी हुए क्योंकि केस में इस्तेमाल DNA प्रक्रिया दोषपूर्ण थी। उनकी बरी होने को ‘प्रक्रियागत जीत’ कहा गया, लेकिन किसी ने यह सवाल नहीं किया — अगर वह नहीं, तो अपराध किसने किया?
हमारा न्याय तंत्र अक्सर आरोपी पर ही पूरा ध्यान केंद्रित कर देता है, जबकि असली अपराधी को खोजने की ज़रूरत भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। न्याय का मतलब संतुलन है।
जवाबदेही का अभाव
निठारी जैसे मामलों में असल समस्या है जवाबदेही की कमी। जांच अधिकारी, फॉरेंसिक विशेषज्ञ और अभियोजन पक्ष गंभीर गलतियाँ कर सकते हैं, जैसे— सबूत खो देना, अधूरी वैज्ञानिक जांच, कमजोर केस तैयार करना। फिर भी उनके खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं होती।
भारत में पुलिसिंग, अभियोजन और फॉरेंसिक सेवाओं की गुणवत्ता मापने के लिए कोई पारदर्शी, डेटा-आधारित मॉडल मौजूद नहीं है। दोषसिद्धि की गुणवत्ता, जांच की समय-सीमा और फैसलों के पैटर्न से जुड़ा डेटा या तो मिलता ही नहीं या सार्वजनिक नहीं किया जाता। डेटा बिना निदान असंभव है, और जवाबदेही बिना सुधार भी असंभव।
न्याय सिर्फ केस खत्म करना नहीं है
निठारी बरी होने के फैसले बताते हैं कि हमारा न्याय तंत्र मामलों को बंद तो कर देता है, लेकिन जरूरी नहीं कि न्याय भी दे सके। कानून की नजर में आरोपी भले आज़ाद हों — लेकिन मारे गए बच्चे अब भी न्याय की प्रतीक्षा में हैं।
एक ऐसा देश जो खुद को संवैधानिक मूल्यों पर गर्व से खड़ा बताता है, वह ऐसा न्याय स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें सच की जगह केवल औपचारिकता को अहमियत मिले। भारत को ऐसी आपराधिक न्याय प्रणाली की जरूरत है जिसमें सच, जवाबदेही, पीड़ितों के अधिकार निहित हों, बाद में सोचने वाली चीजें न हों। न्याय सिर्फ बेगुनाह को बरी करने के लिए नहीं है — वह असली दोषियों को पकड़ने और सज़ा दिलाने के लिए भी उतनी ही दृढ़ता से काम करे।




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