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क्या भारत को डिग्रियों से ज़्यादा कौशल की ज़रूरत है? 

Does India Need Skills More Than Degrees?

भारत में बेरोज़गारों की सबसे बड़ी संख्या उन युवाओं की है जिनके पास डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन बाज़ार की जरूरतों के हिसाब से कौशल नहीं।

 

भारत में शिक्षा को लंबे समय तक एक ही नज़रिये से देखा गया—अच्छी डिग्री मतलब अच्छी नौकरी। माता-पिता से लेकर शिक्षक और समाज तक, सबने बच्चों को यही रास्ता दिखाया। लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था, तकनीक का दबदबा, और तेज़ी से बदलते रोजगार बाज़ार ने साफ कर दिया है कि सिर्फ डिग्री अब सफलता की गारंटी नहीं है। आज बड़ी कंपनियाँ कौशल को प्राथमिकता दे रही हैं, और यह सवाल गंभीरता से उभर रहा है—क्या भारत के युवाओं को डिग्रियों से ज़्यादा स्किल्स की ज़रूरत है?

सच्चाई यह है कि भारत में बेरोज़गारों की सबसे बड़ी संख्या उन युवाओं की है, जिनके पास डिग्रियाँ तो हैं, लेकिन बाज़ार की जरूरतों के हिसाब से कौशल नहीं। एक तरफ बी.ए., बी.कॉम, बी.एससी., एम.ए. जैसे पारंपरिक कोर्स लाखों छात्रों को डिग्री तो दे रहे हैं, लेकिन उन्हें नौकरी के वास्तविक कौशल—जैसे कम्युनिकेशन, डिजिटल नॉलेज, प्रॉब्लम-सॉल्विंग, या इंडस्ट्री-विशेष तकनीकी स्किल्स—नहीं दे पा रहे। यही वजह है कि कई कंपनियाँ अब सिर्फ डिग्री के आधार पर भर्ती करने से कतराती हैं और उम्मीदवारों की क्षमताओं को परखने के लिए स्किल टेस्ट को प्राथमिक बना चुकी हैं।

भारत की इस चुनौती को समझते हुए सरकार ने भी कौशल आधारित शिक्षा पर जोर बढ़ाया है। नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (NSDC), स्किल इंडिया मिशन, और PMKVY जैसी पहलकदमियों ने लाखों युवाओं को तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया है, लेकिन यह अब भी पर्याप्त नहीं है। देश में अभी भी वह संरचना नहीं बन पाई है जहाँ स्कूल और कॉलेज स्तर पर कौशल को मुख्यधारा की शिक्षा का हिस्सा बनाया जा सके। जबकि जर्मनी, सिंगापुर जैसे देशों में यह मॉडल दशकों से सफल है।

भारत के युवाओं के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वे डिग्री लेकर भी नौकरी नहीं पाते, और बिना स्किल के अवसर उनके हाथ से छूट जाते हैं। यह स्थिति न केवल छात्रों के लिए निराशाजनक है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती है। जब करोड़ों युवा डिग्री लेकर भी बेरोज़गार रहते हैं, तो इसका सीधा असर देश की उत्पादकता और विकास पर पड़ता है।

यह भी समझने की जरूरत है कि कौशल आधारित शिक्षा का मतलब सिर्फ तकनीकी प्रशिक्षण नहीं है। डिजिटल लिटरेसी, आलोचनात्मक सोच, संचार कौशल, टीम वर्क, डेटा एनालिसिस, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे कौशल भी आज की जरूरत हैं। यही स्किल्स भविष्य के रोजगार तय करेंगे। दुनिया तेजी से बदल रही है, और जो देश इस बदलाव को अपनाएंगे, वही प्रतिस्पर्धा में टिक पाएंगे।

समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। अभी भी कई परिवारों में नौकरी का मतलब सरकारी नौकरी या “डिग्री वाली” नौकरी ही माना जाता है। जबकि आज फ्रीलांसिंग, स्टार्टअप्स, डिजिटल क्रिएशन, और स्किल-बेस्ड प्रोफेशन नए अवसर पैदा कर रहे हैं। भारत की करोड़ों युवा आबादी इस बदलाव के लिए तैयार है, बस उसे दिशा और उपयुक्त प्रशिक्षण की जरूरत है।

अंततः भारत को शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव की जरूरत है—ऐसे बदलाव जो बच्चों को सिर्फ परीक्षाओं के लिए नहीं, बल्कि जीवन और रोजगार के लिए तैयार करें। डिग्री अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन वह तब तक अधूरी है जब तक उसके साथ व्यावहारिक कौशल न जुड़ें। यह समय है जब नीति निर्माता, शिक्षक, अभिभावक और समाज मिलकर यह स्वीकार करें कि आने वाला भारत कौशल पर चलेगा, न कि सिर्फ कागज़ पर लिखी डिग्रियों पर।

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है। अगर इस युवा शक्ति को सही कौशल दिए जाएँ, तो भारत न सिर्फ बेरोजगारी कम कर सकता है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक नई पहचान भी बना सकता है। यही वह समय है जब हमें तय करना होगा—हम अपने युवाओं को सिर्फ डिग्री देंगे या भविष्य के लिए असली ताकत: कौशल।

 

रईस अहमद 'लाली'

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