
पोस्ट-कोविड दौर में भारतीय विश्वविद्यालयों के सामने अब यह सवाल नहीं है कि तकनीक अपनाई जाए या नहीं। कोविड-19 के दौरान यह बहस पूरी तरह खत्म हो चुकी है, जब देशभर के कैंपस को लगभग रातों-रात डिजिटल होना पड़ा। आज उच्च शिक्षा के सामने कहीं ज्यादा जटिल और अहम सवाल खड़ा है—उस तकनीक का सही तरीके से संचालन (गवर्नेंस) कैसे किया जाए, उसे सिस्टम में कैसे जोड़ा जाए और उसे मानवीय कैसे बनाया जाए, जो अब चुपचाप विश्वविद्यालय के पूरे कामकाज का आधार बन चुकी है।
देश के बड़े महानगरों के प्रतिष्ठित संस्थानों से लेकर टियर-2 और टियर-3 शहरों के विश्वविद्यालयों तक, छात्रों का अनुभव पूरी तरह बदल चुका है। आज कोई फाइनल ईयर का छात्र इंटर्नशिप के लिए आवेदन करते समय न तो फाइलों में फोटोस्टेट इकट्ठा करता है और न ही प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर लगाता है। अब स्मार्टफोन ही फाइल फोल्डर की जगह ले चुका है। ट्रांसक्रिप्ट, डिग्री सर्टिफिकेट और क्रेडिट रिकॉर्ड मिनटों में डिजिटल रूप में मिल जाते हैं—जिन्हें आसानी से वेरिफाई, शेयर और इस्तेमाल किया जा सकता है। जो सुविधा कभी गिने-चुने छात्रों तक सीमित थी, वह अब पोस्ट-पैंडेमिक भारतीय विश्वविद्यालयों की नई सामान्य अपेक्षा बनती जा रही है।
यह दिखने में आसान बदलाव असल में एक कहीं गहरे परिवर्तन का संकेत है। तकनीक अब सिर्फ “एड-टेक” तक सीमित नहीं रही, यानी न केवल ऑनलाइन क्लास या वर्चुअल लेक्चर। यह एक एंड-टू-एंड डिजिटल ढांचा बन चुकी है, जो पढ़ाई और मूल्यांकन, दाखिला और परीक्षाएं, गवर्नेंस और अनुपालन, फाइनेंस और एचआर, रिसर्च मैनेजमेंट, कैंपस सुरक्षा और यहां तक कि एलुमनाई जुड़ाव तक को आकार दे रही है। महामारी ने तकनीक को तेजी से अपनाने की रफ्तार बढ़ाई, लेकिन पोस्ट-कोविड दौर में संस्थानों के सामने असली चुनौती है—बिखरे सिस्टम को एकजुट करना, डेटा सुरक्षा सुनिश्चित करना, अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बीच तालमेल बैठाना और ठोस शैक्षणिक व प्रशासनिक परिणाम देना।
आपातकालीन ऑनलाइन क्लास से डिजिटल ढांचे तक
कोविड के दौरान विश्वविद्यालयों ने बेहद तेज़ी से ऑनलाइन पढ़ाई शुरू की। इससे शिक्षा तो चलती रही, लेकिन साथ ही कई कैंपस में “डिजिटल फैलाव” भी देखने को मिला—अलग-अलग ऐप्स, प्लेटफॉर्म और विभागीय जुगाड़, जिन्हें रणनीति से ज्यादा मजबूरी में अपनाया गया था। अब सवाल यह नहीं है कि तकनीक अपनाई जा सकती है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या विश्वविद्यालय सिस्टम को जोड़ सकते हैं, छात्र और संस्थान के डेटा की सुरक्षा कर सकते हैं और तकनीक के जरिए पढ़ाई की गुणवत्ता, रिटेंशन, पारदर्शिता और छात्र अनुभव को बेहतर बना सकते हैं।
भविष्य के लिए तैयार कैंपस अब एक लेयर्ड डिजिटल इकोसिस्टम के रूप में देखे जा रहे हैं। इसकी बुनियाद में मजबूत नेटवर्क और क्लाउड बैकबोन होता है—जो हाई बैंडविड्थ, सुरक्षित और हमेशा सक्रिय रहे। इसके ऊपर अकादमिक कोर होता है, जहां लर्निंग मैनेजमेंट सिस्टम (LMS) को स्टूडेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम से जोड़ा जाता है। सबसे ऊपर “स्मार्ट कैंपस” की परिकल्पना है, जहां सेंसर, ऑटोमेशन, डेटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल क्लासरूम उपयोग, ऊर्जा दक्षता, सुरक्षा अलर्ट और सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है।
बैकबोन, ब्रेन और सेंस
भारत में उच्च शिक्षा का यह बदलाव सिर्फ विश्वविद्यालयों की पहल नहीं है। इसमें राष्ट्रीय डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी भूमिका है। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC), डिजीलॉकर, नेशनल अकादमिक डिपॉजिटरी (NAD) और SWAYAM जैसे प्लेटफॉर्म विश्वविद्यालयों को इंटरऑपरेबिलिटी, मॉड्यूलर सिस्टम और भरोसेमंद डिजिटल सर्टिफिकेट की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं।
नीति का संदेश साफ है—क्रेडिट की आसान ट्रांसफर व्यवस्था, डिजिटल डिग्री पर भरोसा और बड़े पैमाने पर ब्लेंडेड लर्निंग। छोटे या संसाधन-सीमित विश्वविद्यालयों के छात्रों के लिए इसका मतलब है कि वे उभरते क्षेत्रों में बेहतर क्वालिटी के कोर्स चुन सकते हैं, बिना हर कैंपस को अलग से विशेषज्ञता विकसित किए। लेकिन संस्थानों के लिए यह साफ-सुथरे डेटा सिस्टम, स्टैंडर्ड वर्कफ्लो और ऑडिट-रेडी गवर्नेंस की मांग करता है, जिसके लिए कई बार अंदरूनी ढांचे में बड़े बदलाव जरूरी होते हैं।
कैंपस में इंटीग्रेशन की झलक
कुछ शुरुआती उदाहरण यह दिखाते हैं कि भारतीय कैंपस किस दिशा में बढ़ रहे हैं। KIIT यूनिवर्सिटी में बड़े स्तर पर ERP आधारित ऑटोमेशन के जरिए अकादमिक, रिसर्च, कंसल्टेंसी, एचआर और प्रशासन को “एक सिस्टम” की तरह चलाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, BITS पिलानी का AI-आधारित स्मार्ट कैंपस मॉडल दिखाता है कि हाइब्रिड लर्निंग और डिजिटल सेवाएं अब कैंपस डिजाइन का हिस्सा बन रही हैं, न कि बाद में जोड़ी गई सुविधा।
कुछ बदलाव कम दिखाई देते हैं, लेकिन उतने ही अहम हैं। अमिटी यूनिवर्सिटी और IGNOU जैसे संस्थानों में ब्लॉकचेन आधारित सर्टिफिकेट पर प्रयोग, वेरिफिकेशन में देरी और फर्जी डिग्री की समस्या को हल करने की कोशिश है। IIT मद्रास के ऑनलाइन BS डिग्री प्रोग्राम एक ऐसे वितरित विश्वविद्यालय मॉडल की ओर इशारा करते हैं, जहां ऑनलाइन पढ़ाई और ऑफलाइन मूल्यांकन मिलकर एक्सेस और अकादमिक विश्वसनीयता का संतुलन बनाते हैं।
पढ़ाने के तरीके की असली परीक्षा
हालांकि, सिर्फ तकनीक से शिक्षा नहीं बदलती—पेडागॉजी यानी पढ़ाने का तरीका बदलता है। SAMR और TPACK जैसे फ्रेमवर्क यह साफ करते हैं कि सही इंटीग्रेशन के लिए लर्निंग टास्क को दोबारा डिजाइन करना, फैकल्टी को ट्रेन करना और इंस्ट्रक्शनल डिजाइन की संस्थागत क्षमता बनाना जरूरी है। सिर्फ PDF अपलोड करना या लेक्चर रिकॉर्ड करना बदलाव नहीं है; असली बदलाव तब होता है जब मूल्यांकन, फीडबैक, सहयोग और छात्र सहायता को नए सिरे से सोचा जाए।
यहीं कई विश्वविद्यालयों को चुनौती आती है। सॉफ्टवेयर खरीदना आसान है, लेकिन अकादमिक संस्कृति बदलना मुश्किल। पोस्ट-कोविड छात्र इस फर्क को जल्दी समझ लेते हैं। जब पढ़ाई इंटरएक्टिव होती है, फीडबैक समय पर मिलता है, सीखने के रास्ते व्यक्तिगत होते हैं और सिस्टम छात्रों की दिक्कतों पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है—तभी वे बदलाव को महसूस करते हैं।
मानवीय बाधा
तकनीक को अक्सर तकनीकी अपग्रेड के रूप में देखा जाता है, लेकिन असल में यह एक चेंज मैनेजमेंट प्रक्रिया है, जिसके केंद्र में इंसान होते हैं। फैकल्टी का विरोध अक्सर नवाचार के खिलाफ नहीं होता, बल्कि आत्मविश्वास की कमी, बढ़ते काम के दबाव और इस डर से जुड़ा होता है कि कहीं तकनीक क्लासरूम टीचिंग की अहमियत को कम न कर दे।
भारत में इस अंतर को पाटने के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय राष्ट्रीय शिक्षक एवं शिक्षण मिशन (PMMMNMTT) जैसी पहल की गई है, जिसके तहत ICT आधारित पेडागॉजी पर केंद्रित टीचिंग-लर्निंग सेंटर्स के जरिए लाखों शिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया है। साथ ही, “लर्निंग आर्किटेक्ट” के रूप में इंस्ट्रक्शनल डिजाइनर्स की बढ़ती भूमिका यह दिखाती है कि अच्छी डिजिटल शिक्षा के लिए विशेष कौशल और भूमिकाओं की जरूरत होती है।
विरोध कभी-कभी संस्थागत और राजनीतिक भी होता है। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में SWAYAM क्रेडिट ट्रांसफर को लेकर हुई बहसें—जिन्हें “डिजिटल विस्थापन” या “टीचरलेस यूनिवर्सिटी” जैसे डर से जोड़ा गया—असल चिंताओं को दिखाती हैं। जो विश्वविद्यालय इन सवालों को नजरअंदाज करते हैं, वहां भरोसा कमजोर पड़ सकता है। वहीं, जो पारदर्शिता के साथ संवाद करते हैं, वे तकनीक को विकल्प नहीं बल्कि सहायक के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
मानव-केंद्रित डिजिटल विश्वविद्यालय की ओर
पोस्ट-पैंडेमिक भारत के लिए सबक साफ है। तकनीक अब किसी एक विभाग या कुछ उत्साही लोगों का औजार नहीं रही। यह आधुनिक विश्वविद्यालय की जोड़ने वाली कड़ी बन चुकी है—जो सही तरीके से इस्तेमाल होने पर पहुंच बढ़ा सकती है और गुणवत्ता सुधार सकती है, लेकिन गलत तरीके से लागू होने पर असमानता भी बढ़ा सकती है।
आने वाले वर्षों में भारत के डिजिटल विश्वविद्यालयों की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उनके प्लेटफॉर्म कितने आधुनिक हैं, बल्कि इस बात से आंकी जाएगी कि तकनीक का संचालन कितना समझदारी से किया गया, उसे कितनी समावेशी तरीके से लागू किया गया और अकादमिक जीवन में उसे कितनी मानवीय संवेदनशीलता के साथ जोड़ा गया।
(लेखक एडइनबॉक्स में चीफ मेंटर हैं, टेक्नो इंडिया ग्रुप, कोलकाता में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और समूह से जुड़ी कोलकाता स्थित एक विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल एडवाइज़र भी हैं।)




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