
कागज़ों पर देखें तो वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में दुनिया पहले से कहीं आगे बढ़ चुकी है—अधिक क्लीनिक, बेहतर डायग्नोस्टिक्स, अधिक प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और पहले से ज्यादा कवरेज। लेकिन औसत आँकड़ों के पीछे एक सच्चाई छिपी है: जहाँ करोड़ों लोग स्वास्थ्य सेवाओं के करीब आ रहे हैं, वहीं करोड़ों लोग उससे दूर भी जा रहे हैं। नतीजा यह है कि दुनिया एक साथ आगे नहीं बढ़ रही; कुछ समूह ज्यादा आगे निकल रहे हैं, कुछ कम, और कुछ लगभग वहीँ के वहीँ हैं।
2015 के बाद यह असमानता और गहरी हो गई। ज्यादातर देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की कवरेज तो बढ़ी, लेकिन आर्थिक सुरक्षा नहीं बढ़ी। 2015 से पहले प्रगति का मतलब था—ज्यादा लोग बिना आर्थिक बोझ के इलाज पा रहे हैं। लेकिन इसके बाद प्रगति का मतलब हो गया—लोग इलाज तो पा रहे हैं, लेकिन आर्थिक संकट का खतरा पहले जैसा ही बना हुआ है या उससे भी बढ़ गया है। वैश्विक स्तर पर तस्वीर उलटी नहीं हुई, बल्कि दो हिस्सों में बंट गई—एक तरफ पहुँच बढ़ी, दूसरी तरफ वहन क्षमता घटती गई।
महिलाओं पर सबसे ज्यादा असर
जब औसत आँकड़ों को खोलकर देखा जाता है, तो असली तस्वीर सामने आती है। दुनिया भर में महिलाएँ, चाहे देश कोई भी हो, पुरुषों की तुलना में इलाज पाने में अधिक कठिनाई का सामना करती हैं। गरीब, ग्रामीण और कम शिक्षित महिलाओं के लिए यह अंतर और बढ़ जाता है। पिछले एक दशक में अमीर और गरीब परिवारों की महिलाओं के बीच यह खाई लगभग जस की तस बनी हुई है।
तकनीकी रूप से भले ही क्लिनिक पास में हो, लेकिन असल में महिलाओं के लिए वहाँ पहुँचना आसान नहीं होता। यात्रा खर्च, दवाइयों की कीमत, परामर्श शुल्क और एक दिन की मजदूरी का नुकसान—ये सभी मिलकर इलाज को पहुँच से दूर कर देते हैं। कागज़ों में उपलब्ध सेवा ज़मीनी स्तर पर अक्सर अप्राप्य बन जाती है।
पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी
बुजुर्ग लोगों के लिए आर्थिक संकट का खतरा ज्यादा होता है क्योंकि उन्हें लंबे समय तक बार-बार इलाज की जरूरत पड़ती है, जो ज्यादातर दवाइयों पर निर्भर होता है। युवा आबादी पर इसका असर मातृ एवं नवजात सेवाओं की कमजोरी के रूप में दिखाई देता है। माताओं के खराब स्वास्थ्य की चोट सीधे बच्चों पर पड़ती है। स्वास्थ्य प्रणालियाँ इन मुद्दों को अलग-अलग मानती हैं, लेकिन परिवारों में यह बोझ एक ही घर में जमा होता जाता है।
दिव्यांग लोगों पर दोगुना बोझ
भले ही सेवाएँ उपलब्ध हों, दिव्यांग लोगों के लिए उन्हें पाना कई गुना मुश्किल होता है। बार-बार अस्पताल जाना, विशेष उपकरण, सहायक व्यक्ति—ये सभी खर्च बढ़ा देते हैं। नतीजा यह होता है कि सेवाएँ मौजूद होते हुए भी उनके लिए वास्तव में सुलभ नहीं रहतीं।
आर्थिक असमानता का सबसे गहरा असर
दुनिया के सबसे गरीब परिवारों में बीते 20 वर्षों में स्वास्थ्य पर जेब से खर्च लगातार बढ़ा है, जबकि वैश्विक गरीबी कम हुई है। आज का गरीब परिवार इलाज के खर्च से पहले की तुलना में कहीं ज्यादा गहरे संकट में गिर सकता है। खासकर महिलाओं पर इसका असर ज्यादा होता है—वे अक्सर इलाज टाल देती हैं और घर की देखभाल का unpaid बोझ भी उन्हीं पर आता है।
मध्यम आय वाले परिवार भी सुरक्षित नहीं हैं। वे धीरे-धीरे ओपीडी खर्च और दवाइयों की वजह से संकट में आते हैं। ये परिवार गरीबी रेखा के नीचे तो नहीं गिरते, लेकिन इतनी नाज़ुक आर्थिक स्थिति में रहते हैं कि एक गंभीर बीमारी उन्हें मुश्किल में डाल सकती है।
शहर और गाँव—अलग चुनौतियाँ, एक जैसी मुश्किलें
ग्रामीण परिवार दूरी, यात्रा खर्च, मजदूरी के नुकसान और खराब कनेक्टिविटी से जूझते हैं। शहरों में अस्पताल पास होते हैं, लेकिन महंगे। दोनों जगह समस्या एक ही है—सेवा मौजूद है, लेकिन आर्थिक रूप से अप्राप्य।
दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों की तस्वीर
अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया: कवरेज बढ़ी, आर्थिक संकट कम हुआ, पर सबसे गरीब महिलाएँ अब भी पीछे।
लैटिन अमेरिका: संक्रामक रोगों में प्रगति, लेकिन क्रॉनिक बीमारियों का इलाज महंगा।
दक्षिण एशिया: गैर-संचारी रोगों का इलाज अमीरों के लिए ज्यादा सुलभ, गरीबों के लिए कम—क्योंकि सबसे ज्यादा खर्च दवाइयों पर होता है।
पश्चिमी प्रशांत: राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति, लेकिन कुछ समूह पीछे रह गए।
यूरोप: सेवाएँ उपलब्ध, लेकिन गरीब और दिव्यांग लोग अब भी unmet needs झेलते हैं।
सबसे छुपी हुई असमानता: इलाज न लेना
कई लोग इलाज इसलिए नहीं लेते क्योंकि वे जानते हैं कि खर्च वहन नहीं कर पाएंगे। ऐसे लोग आँकड़ों में दिखाई ही नहीं देते—न गरीबी रेखा के नीचे, न स्वास्थ्य उपयोगिता के आँकड़ों में। यह एक “silent crisis” है।
दो तरह का आर्थिक बोझ
- आधारभूत जरूरतों में कटौती कर इलाज जारी रखना — कम खाना, बच्चों की पढ़ाई रोकना, छोटी-छोटी चीजें छोड़ना।
- इंतज़ाम करते-करते परिवार का गरीबी रेखा के नीचे गिर जाना — यह नीति-निर्माण में अधिक ध्यान पाता है।
दोनों हानिकारक हैं, लेकिन गिनती सिर्फ एक की होती है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर बढ़ा, पर क्षमता नहीं
अस्पताल बढ़े हैं, लेकिन स्टाफ, मशीनें और सिस्टम की तैयारी साथ-साथ नहीं बढ़ी। जब सिस्टम पर दबाव बढ़ता है, तो सबसे पहले गरीब परिवार ही सेवाओं से बाहर हो जाते हैं—क्योंकि उनके पास देरी, यात्रा, फॉलो-अप और अतिरिक्त खर्च झेलने की क्षमता नहीं होती।
दवाइयों की कीमत—सबसे बड़ा संकट
आज अधिकांश देशों में परिवारों के स्वास्थ्य खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा दवाइयों पर जाता है। गरीब परिवारों में यह हिस्सा और भी अधिक है।
समस्या अस्पताल जाने की नहीं, लंबे समय तक दवा जारी रखने की है।
2030 की ओर बढ़ती हुई दुनिया
2030 तक सेवा कवरेज तो बढ़ेगी और स्कोर 70 के आसपास पहुँच सकता है, लेकिन दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी अब भी आर्थिक संकट के खतरे में रहेगी।
कागज़ों पर “Universal Health Coverage” करीब दिख सकती है, लेकिन असल में कई लोग अब भी उसके दायरे से बाहर रहेंगे।
आने वाला दशक किसका होगा?
UHC का भविष्य उन समूहों से तय होगा:
– गरीब और ग्रामीण महिलाएँ
– बुजुर्ग और क्रॉनिक बीमारियों से जूझते लोग
– दिव्यांग आबादी
– दवाइयों के खर्च से जूझते परिवार
– मध्यम वर्ग जिसे आँकड़ों में गरीब नहीं माना जाता, पर संकट के कगार पर होता है
अगर दुनिया प्रगति को सिर्फ “औसत” में मापती रही, तो कागज़ों पर सुधार दिखेगा, लेकिन ज़मीन पर असमानता बढ़ती जाएगी।
यदि प्रगति उन लोगों के आधार पर मापी जाए जिन्हें सबसे कम सुरक्षा मिली है—तभी स्वास्थ्य प्रणाली वास्तव में सबके लिए मजबूत बन पाएगी।




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