
सरकारी अस्पतालों में दिन-रात मरीजों की सेवा करने वाले डॉक्टर अब खुद गंभीर स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। लगातार बढ़ती जिम्मेदारियां, स्टाफ की कमी, लंबी ड्यूटी और नाइट शिफ्ट ने उनकी दिनचर्या को इस हद तक प्रभावित किया है कि बड़ी संख्या में चिकित्सक हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और अन्य जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के शिकार होते जा रहे हैं।
यह स्थिति किसी एक अस्पताल की नहीं, बल्कि पूरे देश के चिकित्सा तंत्र के लिए चेतावनी है। जर्नल मिड-लाइफ हेल्थ में प्रकाशित एक नई स्टडी बताती है कि डॉक्टरों की सेहत तेजी से बिगड़ रही है और यह सीधे तौर पर हेल्थकेयर सिस्टम की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।
देशव्यापी अध्ययन ने खोली चिंताओं की परतें
अध्ययन में दिल्ली सहित सात राज्यों के 265 डॉक्टरों को शामिल किया गया। यह रिसर्च 2025 में ऑनलाइन माध्यम से चार महीनों तक चली। शोध में डॉक्टरों की दिनचर्या, काम का दबाव, मानसिक तनाव और स्वास्थ्य मानकों का विश्लेषण किया गया।
इस स्टडी का नेतृत्व आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. प्रभात अग्रवाल ने किया। शोध में कोलकाता और झारखंड के मेडिकल संस्थानों का भी सहयोग रहा, जिससे अध्ययन के निष्कर्ष और व्यापक हो सके।
इलाज करने वालों को ही घेर रहीं गंभीर बीमारियां
शोध के निष्कर्ष हैरान करने वाले हैं। 48% डॉक्टर हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित पाए गए। 23% को डायबिटीज की समस्या मिली। 14% डॉक्टरों में हाई कोलेस्ट्रॉल, थायरॉयड और हृदय रोग जैसी स्थितियां दर्ज हुईं। कुछ चिकित्सकों में मोटापा और धूम्रपान की आदत भी सामने आई।
विशेषज्ञों के अनुसार यह आंकड़े बेहद गंभीर संकेत हैं, क्योंकि ये वही लोग हैं जो देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को संभालते हैं। अगर डॉक्टर ही अस्वस्थ रहेंगे, तो मरीजों को बेहतर इलाज देना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
वर्क-लाइफ बैलेंस बिगड़ना बना बड़ी वजह
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि डॉक्टरों के लिए निरंतर नाइट शिफ्ट, पर्याप्त आराम की कमी और मानसिक दबाव बड़ी समस्या है। कई डॉक्टरों को रोजाना औसतन 12 से 16 घंटे तक काम करना पड़ता है। इससे न केवल शरीर पर असर पड़ता है, बल्कि मानसिक थकान भी बढ़ती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि डॉक्टरों के कार्य घंटे, मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली में सुधार पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका सीधा असर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर पड़ेगा। बेहतर हेल्थकेयर के लिए डॉक्टरों का स्वस्थ रहना उतना ही जरूरी है जितना मरीजों का इलाज करना।
यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि डॉक्टरों की सेहत को हल्के में नहीं लिया जा सकता। सरकार और संबंधित संस्थानों को वर्कफोर्स बढ़ाने, कार्य घंटे संतुलित करने और मानसिक स्वास्थ्य सहायता जैसे कदमों पर तेजी से काम करने की जरूरत है। स्वास्थ्य व्यवस्था तभी मजबूत होगी जब उसे संभालने वाले डॉक्टर स्वस्थ रहेंगे।




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