
बढ़ते तापमान का असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर पुरुषों की तुलना में अधिक और गंभीर हो रहा है। सात राज्यों में किए गए एक नए अध्ययन के अनुसार, अत्यधिक गर्मी वाले जिलों में रहने वाली महिलाएं शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्तर पर कई तरह की समस्याओं का सामना कर रही हैं, जिससे उनकी जीवन गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो रही है।
यह अध्ययन चेन्नई स्थित एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन (MSSRF) द्वारा किया गया है, जिसमें गर्मी से होने वाले तनाव (हीट स्ट्रेस) के जेंडर आधारित प्रभावों पर खास तौर पर ध्यान दिया गया। अध्ययन का उद्देश्य महिलाओं के लिए बेहतर स्वास्थ्य तैयारी और नीतियां विकसित करना है।
शारीरिक समस्याएं सबसे ज्यादा
अध्ययन में शामिल अत्यधिक हीट वल्नरेबिलिटी इंडेक्स (HVI) वाले जिलों की 70% महिलाओं ने बताया कि गर्मी के चरम महीनों में उन्हें थकान, चक्कर आना, डिहाइड्रेशन और पेट से जुड़ी समस्याएं होती हैं। ये लक्षण खासतौर पर 20 से 45 वर्ष की उम्र की महिलाओं में अधिक पाए गए।
मध्यम HVI वाले जिलों में 28% और कम HVI वाले जिलों में 24% महिलाओं ने ऐसे लक्षणों की शिकायत की। अध्ययन में यह भी सामने आया कि गरीब, ग्रामीण इलाकों में रहने वाली, निम्न जातियों से जुड़ी और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं में ये समस्याएं कहीं ज्यादा गंभीर थीं।
प्रजनन और मासिक धर्म से जुड़ी दिक्कतें
कई महिलाओं ने मूत्र संक्रमण (यूटीआई), अनियमित रक्तस्राव और मासिक धर्म चक्र में गड़बड़ी जैसी समस्याओं की बात कही। हालांकि, इनमें से बहुत कम महिलाओं ने इलाज के लिए डॉक्टर से संपर्क किया। इसके अलावा, लगभग 97% महिलाओं ने बताया कि अप्रैल, मई और जून के दौरान उन्हें 1,500 रुपये से अधिक की मजदूरी का नुकसान हुआ।
मानसिक स्वास्थ्य और घरेलू तनाव
गर्मी का असर महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा देखा गया। अध्ययन के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के दौरान महिलाओं में चिंता, चिड़चिड़ापन और बेचैनी बढ़ जाती है। भीड़भाड़ वाले घर, बार-बार बिजली कटौती और बिना मेहनताना मिलने वाले घरेलू काम का बोझ इस स्थिति को और खराब कर देता है।
करीब 41% महिलाओं ने ज्यादा गुस्सा या चिड़चिड़ापन महसूस करने की बात कही, 33% ने तनाव और चिंता बढ़ने की शिकायत की, जबकि 32% महिलाओं ने नींद न आने या नींद के पैटर्न में बदलाव की समस्या बताई। चौंकाने वाली बात यह है कि 38% महिलाओं ने जीवन में कम से कम एक बार हिंसा का सामना करने की बात कही, जबकि 72% ने अप्रैल से जून के बीच हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी महसूस की। इससे यह संकेत मिलता है कि अत्यधिक गर्मी, आर्थिक दबाव और घरेलू तनाव के बीच गहरा संबंध है।
नीतियों में महिलाओं की आवाज़ जरूरी
MSSRF की चेयरपर्सन सौम्या स्वामीनाथन, जो इस अध्ययन समूह का भी हिस्सा थीं, ने रिपोर्ट में कहा,
“हीट स्ट्रेस पर जेंडर आधारित शोध अभी भी बहुत कम है और जलवायु नीतियों तथा स्वास्थ्य तैयारियों में महिलाओं के अनुभव अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं। यह रिपोर्ट दिखाती है कि अत्यधिक गर्मी महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके इलाज तक पहुंच को कैसे प्रभावित करती है।”
अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता प्रियदर्शिनी राजमणि के अनुसार, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) के आंकड़ों को भारत मौसम विज्ञान विभाग के हीट मैप के साथ जोड़ा गया। इसके आधार पर राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, ओडिशा, तेलंगाना और तमिलनाडु के जिलों को अध्ययन के लिए चुना गया। इन जिलों में 3,300 महिलाओं से प्राथमिक सर्वे किया गया और फोकस ग्रुप चर्चाओं के जरिए आंकड़ों को और मजबूत किया गया।
आगे और शोध की जरूरत
डॉ. स्वामीनाथन ने बताया कि अगले चरण में तमिलनाडु और कर्नाटक के चार स्थानों पर क्रॉस-सेक्शनल और लॉन्गिट्यूडिनल अध्ययन करने की योजना है। उनका कहना है कि चरम जलवायु घटनाओं से निपटने के लिए सरकारों को ठोस आंकड़ों की जरूरत है, ताकि समय रहते प्रभावी कदम उठाए जा सकें।
यह अध्ययन साफ तौर पर संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन का असर महिलाओं पर कहीं ज्यादा गहरा है और इससे निपटने के लिए जेंडर-संवेदनशील नीतियों और स्वास्थ्य रणनीतियों की तत्काल जरूरत है।




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