
कोलकाता स्थित जादवपुर यूनिवर्सिटी (JU) एक बार फिर विवाद के केंद्र में है। इस बार मामला कथित इस्लामोफोबिया के आरोपों से जुड़ा है, जिसे लेकर विश्वविद्यालय के वार्षिक दीक्षांत समारोह के दौरान दो छात्राओं ने शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराया। डिग्री और प्रमाण पत्र लेते समय छात्राओं ने मंच पर एक पोस्टर दिखाया, जिस पर लिखा था— “जादवपुर यूनिवर्सिटी में इस्लामोफोबिया के लिए कोई जगह नहीं है।”
यह विरोध किसी नारेबाजी या हंगामे के बिना किया गया, लेकिन इसके बाद विश्वविद्यालय परिसर और अकादमिक हलकों में इस मुद्दे पर बहस तेज हो गई है।
परीक्षा के दौरान हुई घटना से जुड़ा है मामला
छात्राओं का कहना है कि यह विरोध हाल ही में आयोजित इंग्लिश सेमेस्टर परीक्षा के दौरान हुई एक घटना के खिलाफ था। आरोप है कि परीक्षा के समय एक इनविजिलेटर ने थर्ड ईयर की एक अंडरग्रेजुएट छात्रा से, जो हेड स्कार्फ (हिजाब) पहने हुई थी, अपनी सहपाठी की मौजूदगी में स्कार्फ आंशिक रूप से हटाने को कहा। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना बताया गया कि छात्रा किसी वायरलेस हेडफोन के जरिए नकल तो नहीं कर रही है।
छात्राओं के मुताबिक, जांच के दौरान किसी भी तरह की संदिग्ध सामग्री नहीं मिली। विरोध करने वाली एक छात्रा ने मीडिया से कहा, “हमारी जूनियर के साथ जो हुआ, उससे उसकी भावनाएं आहत हुईं। जादवपुर यूनिवर्सिटी जैसे उदार और धर्मनिरपेक्ष संस्थान में ऐसा व्यवहार हमें स्वीकार्य नहीं लगा। इसलिए हमने दीक्षांत समारोह में शांतिपूर्वक अपनी बात रखी।”
SFI ने खुद को किया अलग
इस पूरे घटनाक्रम के बीच छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने खुद को इस विरोध से अलग कर लिया है। संगठन के एक नेता ने स्पष्ट किया कि पोस्टर दिखाना छात्राओं का व्यक्तिगत फैसला था और इसका एसएफआई के किसी भी आधिकारिक आंदोलन या मांग से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि संगठन किसी ऐसे कदम का समर्थन नहीं करता, जिससे किसी समुदाय या व्यक्ति की भावनाएं आहत हों।
फैकल्टी ने आरोपों को बताया निराधार
दूसरी ओर, विश्वविद्यालय के फैकल्टी सदस्यों ने इस्लामोफोबिया के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। इंग्लिश विभाग के एक वरिष्ठ प्रोफेसर ने बताया कि हाल के दिनों में परीक्षा के दौरान नकल के कई मामले सामने आए थे, जिसके चलते निगरानी कड़ी की गई थी। उनके अनुसार, पिछले सप्ताह कम से कम चार छात्र हेडफोन के जरिए नकल करते पकड़े गए थे, जिनमें कोई भी अल्पसंख्यक समुदाय से नहीं था।
प्रोफेसर ने कहा कि उसी दिन एक अन्य छात्रा को हूडी पहनकर हेडफोन का इस्तेमाल करते हुए पकड़ा गया था। उसे एक अन्य थर्ड ईयर छात्रा की मौजूदगी में पास के कमरे में ले जाकर जांच की गई, जहां किसी और की मौजूदगी नहीं थी। सहयोग के बाद छात्रा को परीक्षा जारी रखने दी गई।
फैकल्टी का दावा: चयनात्मक कार्रवाई नहीं हुई
फैकल्टी सदस्यों का यह भी कहना है कि उसी परीक्षा में हिजाब पहनने वाली दो अन्य छात्राओं, जिनमें एक दिव्यांग छात्रा भी शामिल थी, की कोई जांच नहीं की गई। उनके मुताबिक, किसी एक घटना के आधार पर पूरे संस्थान पर इस्लामोफोबिया जैसे गंभीर आरोप लगाना अनुचित है।
एक प्रोफेसर ने चिंता जताते हुए कहा कि यदि शिक्षकों को इस तरह निशाना बनाया जाएगा, तो उनके लिए निष्पक्ष तरीके से अपनी जिम्मेदारियां निभाना मुश्किल हो सकता है।
वाइस चांसलर ने जांच का दिया आश्वासन
हालांकि जादवपुर यूनिवर्सिटी की ओर से अब तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है, लेकिन वाइस चांसलर चिरंजीब भट्टाचार्य ने कहा है कि छात्रों ने उन्हें एक पत्र सौंपा है और पूरे मामले की जांच की जा रही है।
फिलहाल, यह मामला कैंपस में संवेदनशील बहस का विषय बना हुआ है—जहां एक ओर छात्र सम्मान और धार्मिक पहचान से जुड़े सवाल उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर फैकल्टी निष्पक्ष परीक्षा व्यवस्था और अकादमिक अनुशासन की बात कर रही है। जांच के नतीजों पर अब सभी की नजरें टिकी हैं।




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