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नीति आयोग की रिपोर्ट: भारतीय उच्च शिक्षा को वैश्विक बनाने की नई रूपरेखा- ‘स्टडी अब्रॉड’ से ‘स्टडी इन इंडिया’ हब तक

नीति आयोग की रिपोर्ट: भारतीय उच्च शिक्षा को वैश्विक बनाने की नई रूपरेखा- ‘स्टडी अब्रॉड’ से ‘स्टडी इन इंडिया’ हब तक

नीति आयोग की रिपोर्ट: भारतीय उच्च शिक्षा को वैश्विक बनाने की नई रूपरेखा- ‘स्टडी अब्रॉड’ से ‘स्टडी इन इंडिया’ हब तक

भारत ने दशकों तक अपनी प्रतिभा को दुनिया के अलग-अलग देशों में भेजा। लाखों छात्र विदेशों में पढ़ाई के लिए गए और देश के कई बेहतरीन शिक्षक व शोधकर्ता वहीं अपने करियर बना सके। लेकिन अब तस्वीर बदलने की तैयारी है। दिसंबर 2025 में जारी नीति आयोग की नई रिपोर्ट कहती है कि भारतीय उच्च शिक्षा का अगला चरण केवल छात्रों को बाहर भेजने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें अंतरराष्ट्रीय छात्रों और फैकल्टी को भारत आकर्षित करना, सीमा-पार शोध को बढ़ावा देना और वैश्विक स्तर पर जुड़े कैंपस विकसित करना शामिल होना चाहिए — वह भी भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान को बनाए रखते हुए।

यह रिपोर्ट ‘Internationalisation of Higher Education in India: Prospects, Potential and Policy Recommendations’ (दिसंबर 2025) नीति आयोग के शिक्षा प्रभाग द्वारा आईआईटी मद्रास के नेतृत्व वाले एक कंसोर्टियम के सहयोग से तैयार की गई है। यह स्पष्ट रूप से एक शोध और नीति सुझाव दस्तावेज है, न कि बाध्यकारी सरकारी नीति। रिपोर्ट की खास बात यह है कि इसमें “अंतरराष्ट्रीयकरण” को केवल शब्दों तक सीमित न रखकर उसे लागू करने की ठोस योजना दी गई है—5 प्रमुख स्तंभ, 22 नीति सिफारिशें, 76 कार्य मार्ग और 125 प्रदर्शन संकेतक।

अंतरराष्ट्रीयकरण का मतलब सिर्फ विदेशी छात्र नहीं

नीति आयोग के अनुसार, अंतरराष्ट्रीयकरण का अर्थ भारतीय विश्वविद्यालयों के पढ़ाने, शोध करने, साझेदारी और वैश्विक पहचान के पूरे तंत्र को नया रूप देना है। इसमें ‘इंटरनेशनलाइजेशन एट होम’, छात्र और फैकल्टी मोबिलिटी, अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग, विदेशी छात्र कार्यालय, ऑनशोर-ऑफशोर कैंपस, और भारतीय ज्ञान परंपराओं को वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करना शामिल है।

रिपोर्ट यह भी मानती है कि चुनौती सिर्फ एडमिशन की नहीं है। वीजा प्रक्रिया, डिग्री की मान्यता, क्रेडिट ट्रांसफर, कैंपस सपोर्ट, सुरक्षा और वह “सॉफ्ट इंफ्रास्ट्रक्चर” भी अहम है, जिससे विदेशी छात्र और शिक्षक भारत में सहज महसूस कर सकें।

लक्ष्य: 2047 तक वैश्विक औसत के करीब

रिपोर्ट ने समयबद्ध लक्ष्य तय किए हैं। 2047 तक भारत में अंतरराष्ट्रीय छात्र मोबिलिटी को 1.0% तक ले जाने का प्रस्ताव है, जिसका मतलब लगभग 8 लाख विदेशी छात्रों का भारत में अध्ययन करना होगा। रिपोर्ट का साफ संदेश है—यदि भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र बनना है, तो विदेशी छात्रों की संख्या बढ़ाना अनिवार्य है और इसके लिए शिक्षा, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और राज्य सरकारों के बीच समन्वय जरूरी होगा।

प्रमुख प्रस्ताव और उनकी भूमिका

रिपोर्ट में कई बड़े प्रस्ताव रखे गए हैं, जैसे—

ग्लोबल हायर एजुकेशन हब्स: देश के अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षा आधारित नवाचार क्लस्टर।

GIFT IFSC एजुकेशन ज़ोन: गिफ्ट सिटी को अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित करना।

टैगोर फ्रेमवर्क: ASEAN, BIMSTEC और BRICS देशों के साथ बहुपक्षीय छात्र और फैकल्टी एक्सचेंज।

भारत विद्या कोष: प्रवासी भारतीयों के सहयोग से शोध और नवाचार के लिए कोष।

विश्व बंधु स्कॉलरशिप और फेलोशिप: अंतरराष्ट्रीय छात्रों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करने की पहल।

भारत विद्या मंथन: उच्च शिक्षा और शोध पर वार्षिक वैश्विक सम्मेलन।

स्टडी इन इंडिया (नया रूप): विदेशी छात्रों के लिए एक ही प्लेटफॉर्म पर सभी सुविधाएं।

रणनीति और नियमन पर जोर

रिपोर्ट का पहला स्तंभ अंतरराष्ट्रीयकरण को पूरे सरकारी तंत्र की साझा जिम्मेदारी मानता है। इसमें ग्लोबल हब्स बनाने, विश्वविद्यालयों को प्रोत्साहन देने और ‘डिजिटल इंडिया’ व ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे मिशनों से जोड़ने की बात है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें गैर-स्टेम विषयों—जैसे प्रबंधन, कानून, संचार और भाषाओं—पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया।

नियमन के स्तर पर रिपोर्ट वीजा प्रक्रिया सरल करने, विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए नियम आसान करने और भारतीय संस्थानों के साथ साझा कैंपस मॉडल को बढ़ावा देने की सिफारिश करती है। साथ ही, NIRF रैंकिंग में अंतरराष्ट्रीयकरण से जुड़े मानकों को शामिल करने का सुझाव भी है।

क्षेत्रीय मोबिलिटी के लिए ‘टैगोर फ्रेमवर्क’

रिपोर्ट केवल द्विपक्षीय समझौतों तक सीमित नहीं रहना चाहती। यह ‘एरास्मस’ जैसी बहुपक्षीय प्रणाली का प्रस्ताव रखती है, जिसे ‘टैगोर फ्रेमवर्क’ नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य ग्लोबल साउथ के देशों के बीच आसान, मान्यता प्राप्त और व्यवस्थित शैक्षणिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना है।

वित्त और स्कॉलरशिप

अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए दीर्घकालिक फंडिंग जरूरी मानी गई है। भारत विद्या कोष के तहत 10 अरब डॉलर का कोष बनाने का प्रस्ताव है, जिसमें प्रवासी भारतीयों और सरकार की समान भागीदारी होगी।

इसके अलावा, विश्व बंधु स्कॉलरशिप और फेलोशिप को फुलब्राइट और शेवनिंग जैसी वैश्विक स्कीम्स के बराबर लाने की बात कही गई है।

शिक्षा को कूटनीति के रूप में देखना

रिपोर्ट मानती है कि उच्च शिक्षा भी एक तरह की कूटनीति है। इसलिए अलग-अलग देशों के लिए अलग रणनीति, ‘भारतीय एलुमनाई एंबेसडर नेटवर्क’ और ‘भारत विद्या मंथन’ जैसे मंचों की सिफारिश की गई है। ‘स्टडी इन इंडिया’ को एक सिंगल-विंडो प्लेटफॉर्म बनाने पर भी जोर है।

पाठ्यक्रम, संस्कृति और छात्र अनुभव

नीति आयोग का मानना है कि वैश्विक बनने का मतलब अपनी पहचान खोना नहीं होना चाहिए। पाठ्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ भारतीय ज्ञान परंपराओं को शामिल करने, भाषाई और सांस्कृतिक तैयारी पर ध्यान देने की बात कही गई है।

विदेशी छात्रों के लिए सुरक्षा, आवास, काउंसलिंग और सहयोग को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया है, क्योंकि वैश्विक शिक्षा में छात्र अनुभव ही सबसे बड़ा भरोसे का आधार बनता है।

चुनौतियां और निष्कर्ष

रिपोर्ट की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्पष्टता है, लेकिन इसके साथ कुछ जोखिम भी हैं—मंत्रालयों के बीच समन्वय, गुणवत्ता बनाए रखना और विश्वविद्यालयों की कार्यान्वयन क्षमता।

कुल मिलाकर, नीति आयोग इस रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीयकरण को ‘विकसित भारत 2047’ से जोड़ता है। यदि इसे गंभीरता से लागू किया गया, तो भारत केवल छात्रों को भेजने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक उच्च शिक्षा का मेजबान और साझेदार बन सकता है। हालांकि, NEP 2020 के कार्यान्वयन की रफ्तार को देखते हुए, इन लक्ष्यों की समय-सीमा और प्रभाव को लेकर सवाल भी बने रहेंगे।

(लेखक एडइनबॉक्स में चीफ मेंटर हैं, टेक्नो इंडिया ग्रुप, कोलकाता में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और समूह से जुड़ी कोलकाता स्थित एक विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल एडवाइज़र भी हैं।)

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