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क्या स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा को गंभीरता से शामिल किया जा रहा है?

क्या स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा को गंभीरता से शामिल किया जा रहा है?

क्या स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा को गंभीरता से शामिल किया जा रहा है?

क्लाइमेट चेंज आज सिर्फ वैज्ञानिक बहस नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के भविष्य से जुड़ा मुद्दा बन चुका है। भारत जैसे देश, जहाँ जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है और मौसम असामान्य ढंग से बदल रहा है, वहाँ पर्यावरण शिक्षा केवल एक अतिरिक्त विषय नहीं रह गई; यह जीवन का जरूरी हिस्सा बन चुकी है। सवाल यह है कि क्या हमारे स्कूल इस चुनौती को समझ रहे हैं? क्या आज के बच्चे—जो आने वाले कल के निर्णयकर्ता होंगे—क्लाइमेट चेंज के प्रभावों और समाधान के बारे में सही तरह से सीख रहे हैं?

पर्यावरण शिक्षा ‘एक अध्याय’ तक सीमित क्यों?

अधिकतर भारतीय स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा सिर्फ किताबों में मौजूद कुछ अध्यायों तक सीमित है। छात्रों को जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता, और प्राकृतिक संसाधनों के बारे में जानकारी तो दी जाती है, लेकिन यह जानकारी एक परीक्षा-आधारित विषय बनकर रह जाती है।

कई स्कूलों में इसे गंभीरता से नहीं पढ़ाया जाता, और कई बच्चों के लिए ये सिर्फ याद करने भर की बातें रह जाती हैं—वास्तविक जीवन से जुड़ा कोई अनुभव या समझ नहीं बन पाती।

Climate Crisis इतनी गंभीर क्यों है?

देश के कई हिस्सों में तापमान साल-दर-साल बढ़ रहा है। बारिश का पैटर्न बदल रहा है। फसलों पर असर पड़ रहा है। हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। समुद्री इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है। जब ऐसे हालात हमारे सामने हों, तो शिक्षा प्रणाली का दायित्व बनता है कि वह बच्चों को न सिर्फ जानकारी दे, बल्कि उन्हें समाधान का हिस्सा भी बनाए।

नई शिक्षा नीति क्या कहती है?

NEP 2020 में पर्यावरण और सतत विकास को पढ़ाई का एक मुख्य तत्व बनाने पर जोर दिया गया है। लेकिन चुनौती यह है कि इस नीति का प्रभाव कितने स्कूलों तक पहुंच पा रहा है। ज्यादातर सरकारी स्कूलों में संसाधनों की कमी है, और कई निजी स्कूल इस विषय को परीक्षा में कम वेटेज होने के कारण गंभीरता से नहीं लेते।

बच्चों को “क्लाइमेट-स्मार्ट” बनाने की जरूरत

पर्यावरण शिक्षा सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि व्यवहार और सोच में बदलाव है। बच्चों को यह समझाने की जरूरत है कि पानी और ऊर्जा कैसे बचाई जाए, कचरा कैसे कम किया जाए, प्लास्टिक का उपयोग क्यों नुकसानदायक है, पौधारोपण क्यों जरूरी है, कार्बन फुटप्रिंट क्या होता है और सबसे महत्वपूर्ण—क्लाइमेट चेंज के खिलाफ वे खुद क्या कर सकते हैं। यह तभी होगा जब स्कूल बच्चों को प्रोजेक्ट आधारित सीखने, फील्ड विज़िट्स, और वास्तविक गतिविधियों से जोड़ें, न कि केवल किताबों तक सीमित रखें।

तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग

AI, इंटरैक्टिव ऐप्स, और वर्चुअल फील्ड टूर जैसे आधुनिक साधन बच्चों को क्लाइमेट चेंज के बारे में समझने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन यह भी तभी संभव है जब शिक्षकों को इस दिशा में प्रशिक्षण दिया जाए।

क्या शिक्षा प्रणाली तैयार है?

सच कहा जाए तो अभी भारत में पर्यावरण शिक्षा एक गंभीर एजेंडा बनने की प्रक्रिया में है—लेकिन यह पूरी तरह लागू नहीं हो पाया है। जब तक स्कूल टेस्ट-केंद्रित प्रणाली से बाहर नहीं आएंगे और छात्रों को वास्तविक जीवन से जोड़कर शिक्षा नहीं देंगे, तब तक क्लाइमेट चेंज जैसे बड़े मुद्दे किताबों से बाहर नहीं निकल पाएंगे।

यह समय है जब स्कूलों, सरकारों और समाज को मिलकर यह तय करना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन पर जागरूकता सिर्फ ‘सिलेबस का हिस्सा’ नहीं, बल्कि ‘मानसिकता का हिस्सा’ बने। क्योंकि, आने वाले दशकों में वही समाज सुरक्षित रहेगा जहाँ बच्चे पर्यावरण को समझते हैं और उसकी रक्षा के लिए जिम्मेदार भूमिका निभाते हैं।

रईस अहमद 'लाली'

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