
कई राज्यों से हाल के दिनों में ऐसी खबरें सामने आई हैं, जिनमें शिक्षकों को स्कूलों में आवारा कुत्तों की निगरानी, उन्हें भगाने या नियंत्रण में रखने जैसी जिम्मेदारियां दी जा रही हैं। यह स्थिति जितनी अजीब लगती है, उतनी ही चिंताजनक भी है। जिस व्यवस्था की नींव शिक्षा के विकास, शिक्षण-गुणवत्ता और छात्रों के भविष्य पर होनी चाहिए, वहां अब शिक्षक गैर-शैक्षणिक कामों में उलझाए जा रहे हैं—वह भी ऐसे काम, जिनका उनके मूल पेशे से कोई संबंध नहीं है।
शिक्षकों का समय किस काम में लगेगा?
एक शिक्षक का समय और ऊर्जा सबसे अधिक मूल्यवान होती है, क्योंकि वही बच्चों के सीखने की दिशा तय करता है। लेकिन जब प्रशिक्षित शिक्षक कुत्तों की निगरानी जैसे कार्यों में लगाए जाते हैं, तो इसका सीधा असर कक्षाओं पर पड़ता है। यह न केवल शिक्षकों की गरिमा के खिलाफ है, बल्कि शिक्षा की आधारभूत गुणवत्ता को भी कमजोर करता है।
आज सरकारी स्कूलों में पहले से ही शिक्षकों की कमी, दोहरी जिम्मेदारियां और प्रशासनिक दबाव का बोझ है। उस पर इस तरह के गैर-जरूरी दायित्व जोड़ना एक बड़े तंत्र की अव्यवस्था को उजागर करता है।
क्या यह समाधान है या जिम्मेदारी से बचना?
स्कूलों में आवारा कुत्तों की समस्या वास्तविक है, लेकिन इसका समाधान शिक्षकों को सुरक्षा कर्मियों की तरह इस्तेमाल करना नहीं हो सकता। स्थानीय निकाय, नगर निगम और पशु नियंत्रण विभाग जैसे संस्थान इन मुद्दों को संभालने के लिए बने हैं। जब उनकी जिम्मेदारी शिक्षकों पर डाल दी जाती है, तो यह प्रशासन की विफलता का संकेत माना जाना चाहिए।
कुत्तों की बढ़ती संख्या, उनका स्कूल परिसरों तक पहुंचना, बच्चों की सुरक्षा—ये सभी गंभीर मुद्दे हैं, लेकिन शिक्षक इन समस्याओं का विशेषज्ञ समाधान नहीं दे सकते। शिक्षा विभाग का काम शिक्षकों को पढ़ाई के अनुकूल वातावरण देना है, न कि उन्हें हर समस्या का आपातकालीन समाधान बनाना।
शिक्षकों की भूमिका का अपमान
शिक्षक की भूमिका समाज में सम्मानित मानी जाती है। वह ज्ञान का वाहक, मार्गदर्शक और बच्चों के भविष्य का निर्माता होता है। जब एक शिक्षक को कुत्तों की गश्त जैसे काम पर लगाया जाता है, तो यह न केवल उसके पेशे का अवमूल्यन है, बल्कि यह बच्चों को भी गलत संदेश देता है कि शिक्षा की प्राथमिकता कितनी नीचे गिर चुकी है।
शिक्षक यदि कक्षाओं में कम समय देंगे, तो सीखने के परिणाम प्रभावित होंगे। पहले ही सरकारी स्कूलों में सीखने के स्तर को लेकर चिंता है। ऐसे में यह कदम शिक्षा के मिशन से मेल नहीं खाता।
नीतिगत स्पष्टता की मांग
जरूरत इस बात की है कि राज्यों के शिक्षा विभाग स्पष्ट नीति बनाएं—शिक्षक केवल शैक्षणिक और शिक्षा-संबंधी जिम्मेदारियां ही निभाएंगे। अन्य सभी कार्य संबंधित विभागों को सौंपे जाएं। यदि स्कूल परिसरों की सुरक्षा चिंताएं बढ़ रही हैं, तो इसके लिए स्वतंत्र स्टाफ, सुरक्षा गार्ड या पशु नियंत्रण टीमें नियुक्त की जानी चाहिएं।
यह भी महत्वपूर्ण है कि शिक्षक संगठनों की आवाज सुनी जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी स्थिति में शिक्षण कार्य बाधित न हो।
शिक्षा को प्राथमिकता दीजिए, शिक्षक को नहीं भटकाइए
शिक्षक से पढ़ाने का काम लेकर उसे कुत्तों की निगरानी सौंप देना शिक्षा प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। यदि हम चाहते हैं कि बच्चे बेहतर सीखें, सरकारी स्कूल मजबूत हों और शिक्षा का स्तर सुधरे, तो सबसे पहले शिक्षकों को उनके मूल कार्य में लौटने देना होगा।
समय आ गया है कि सरकारें यह समझें— शिक्षा तभी सुधरेगी, जब शिक्षक पढ़ाने के लिए मुक्त होंगे, न कि हर प्रशासनिक कमी की पूर्ति के लिए नियुक्त।




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