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Strategic Design Education: भविष्य की समस्याओं के लिए सोचने का नया तरीका

डिग्री नहीं, समाधान: क्यों भारत को अब इनोवेशन यूनिवर्सिटी की जरूरत है

डिग्री नहीं, समाधान: क्यों भारत को अब इनोवेशन यूनिवर्सिटी की जरूरत है

आज किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय के कैंपस में कदम रखते ही दो साफ रुझान दिखाई देते हैं। एक तरफ उत्साह है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और डिजिटल टूल्स ने छात्रों को पहले से कहीं ज्यादा सक्षम बना दिया है। वे डिजाइन कर रहे हैं, लिख रहे हैं, ऐप और प्रोटोटाइप बना रहे हैं—वह भी महीनों में नहीं, कई बार हफ्तों में। दूसरी तरफ चिंता भी उतनी ही गहरी है। जॉब मार्केट अनिश्चित है, बिजनेस साइकल भरोसेमंद नहीं रहे और कई भूमिकाएं इतनी तेजी से बदल रही हैं कि सिलेबस अपडेट होने से पहले ही काम का स्वरूप बदल जाता है।

इसी टकराव के बीच उच्च शिक्षा के सामने सबसे अहम सवाल खड़ा होता है—आखिर विश्वविद्यालय छात्रों को किसके लिए तैयार कर रहा है? अगर जवाब सिर्फ “नौकरी” है, तो संस्थान पहले ही पीछे छूट रहा है। लेकिन अगर उद्देश्य यह है कि छात्र अनिश्चित हालात में भी मूल्य निर्माण कर सकें, तो विश्वविद्यालय की भूमिका पूरी तरह बदल जाती है। तब शिक्षा का मकसद सिर्फ डिग्री देना नहीं, बल्कि नवाचार को रोजमर्रा की आदत बनाना होता है—हर विषय में, हर विभाग में और पूरे कैंपस सिस्टम में।

क्या है ‘इनोवेशन यूनिवर्सिटी’ की सोच

इनोवेशन यूनिवर्सिटी किसी नए सेंटर, इमारत या लोगो का नाम नहीं है। यह पूरे कैंपस का ऑपरेटिंग सिस्टम है। इसमें लीडरशिप, संस्कृति, मूल्यांकन, प्रोत्साहन, संसाधन और इंडस्ट्री व समाज से साझेदारी—सब इस तरह जुड़ते हैं कि नए विचार पैदा करना और उन्हें लागू करना सामान्य प्रक्रिया बन जाए।

यहां सवाल सिर्फ स्टार्टअप बनाने का नहीं, बल्कि समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करने का है। भारत जैसे देश में नवाचार की जरूरत हमेशा लैब में होने वाली बड़ी खोजों से नहीं आती। अक्सर जरूरत ऐसे समाधानों की होती है जो सस्ते हों, बड़े पैमाने पर काम कर सकें और जमीनी हालात के अनुकूल हों—चाहे वह स्वास्थ्य सेवाएं हों, शिक्षा, जलवायु से जुड़ी चुनौतियां, स्किलिंग, MSME की उत्पादकता या अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने वाली सरकारी सेवाएं।

‘एंटरप्रेन्योरियल’ से ‘एंगेज्ड’ यूनिवर्सिटी की ओर

दुनिया में विश्वविद्यालयों में नवाचार की चर्चा अक्सर पेटेंट और कमर्शियलाइजेशन तक सीमित रहती है। यह मॉडल उपयोगी है, लेकिन भारत के संदर्भ में इससे आगे जाना जरूरी है। यहां ज्यादा असरदार मॉडल ‘एंगेज्ड यूनिवर्सिटी’ का है—जो आर्थिक विकास में योगदान दे, लेकिन समाज और स्थानीय जरूरतों से जुड़ी रहे।

ऐसे में विश्वविद्यालय एक सुरक्षित मंच बन सकता है, जहां छात्र, फैकल्टी, समुदाय और NGOs मिलकर कम लागत वाले, समावेशी समाधान विकसित करें। जब यह सोच मजबूत होती है, तो विश्वविद्यालय सिर्फ डिग्री बांटने की जगह एक भरोसेमंद विचार-जनक संस्था बन जाता है, जिसका असर कैंपस से बाहर भी दिखता है।

इनोवेशन इवेंट नहीं, सिस्टम है

आज कई कैंपस हैकाथॉन और इनोवेशन फेस्टिवल आयोजित करते हैं। इससे ऊर्जा बनती है, लेकिन अगर सिस्टम नहीं हो, तो यह ऊर्जा जल्दी खत्म हो जाती है। असली बदलाव तब आता है जब इनोवेशन के लिए पूरा ढांचा तैयार किया जाए—जहां अलग-अलग पहल एक-दूसरे को मजबूत करें।

यही सोच ‘10Square मॉडल’ जैसे फ्रेमवर्क को जन्म देती है, जो बताता है कि इनोवेशन कल्चर कुछ गिने-चुने इवेंट्स से नहीं, बल्कि आपस में जुड़े कई लीवरों से बनता है। लक्ष्य यह नहीं कि दस अलग प्रोजेक्ट शुरू कर दिए जाएं, बल्कि यह कि एक ऐसा इकोसिस्टम बने, जहां हर सुधार अगले सुधार को ताकत दे।

लीडरशिप: पहला और सबसे जरूरी टूल

नवाचार सबसे पहले डर में मरता है—असफल होने का डर, जज होने का डर और इस बात का डर कि “इससे ग्रेड नहीं मिलेगा।” सकारात्मक और सहभागी नेतृत्व ही वह माहौल बना सकता है, जहां प्रयोग करना सुरक्षित लगे। जब प्रयासों को सम्मान मिले, सीख को महत्व दिया जाए और असफलता को डेटा माना जाए, तब ही छात्र और फैकल्टी नए विचारों पर काम करने का साहस करते हैं।

यह बदलाव बड़े बजट या नई इमारतों से नहीं, बल्कि सोच बदलने से शुरू होता है। मानक घटाने की नहीं, बल्कि “परफेक्ट जवाब” से “काम करने वाले समाधान” की ओर बढ़ने की जरूरत है।

एडमिशन और ब्रांडिंग में बदलाव जरूरी

इनोवेशन यूनिवर्सिटी सिर्फ अपने प्रोग्राम नहीं बेचती, बल्कि “हल करने लायक समस्याएं” सामने रखती है। प्लेसमेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर की चमक के साथ यह दिखाना जरूरी है कि छात्र स्थानीय उद्योग, अस्पताल, स्कूल, नगर निकाय और NGOs के साथ मिलकर किन वास्तविक चुनौतियों पर काम कर रहे हैं।

इसी तरह एडमिशन प्रक्रिया में भी बदलाव जरूरी है। पोर्टफोलियो, प्रोजेक्ट, हैकाथॉन, क्रिएटिव वर्क और समुदाय के साथ किए गए काम को भविष्य की क्षमता का संकेत माना जाना चाहिए। स्कॉलरशिप भी यहां अहम भूमिका निभा सकती है, क्योंकि भारत में उद्यमिता की राह में सबसे बड़ा जोखिम अक्सर वित्तीय होता है।

पाठ्यक्रम और पेडागॉजी: बनाकर सीखने पर जोर

इनोवेशन को वैकल्पिक विषय मानने की सोच अब पुरानी हो चुकी है। इसे हर छात्र के लिए जरूरी ग्रेजुएट एट्रिब्यूट बनाना होगा। हर प्रोग्राम में चरणबद्ध इनोवेशन पाथवे—बुनियादी मेथड्स, विषय आधारित स्टूडियो, लाइव प्रॉब्लम लैब और अंत में कैपस्टोन प्रोजेक्ट—इस दिशा में ठोस कदम हो सकते हैं।

साथ ही पढ़ाने का तरीका भी बदलना होगा। लेक्चर से ज्यादा अनुभव आधारित सीख जरूरी है। जब छात्र वास्तविक, जटिल समस्याओं पर काम करते हैं, उपयोगकर्ताओं से बात करते हैं और बार-बार सुधार करते हैं, तभी नवाचार की समझ विकसित होती है।

मूल्यांकन वही, जो आप मापते हैं

अगर विश्वविद्यालय सिर्फ परीक्षा और याददाश्त को मापेगा, तो वही मिलेगा। इनोवेशन को मुख्यधारा में लाने के लिए मूल्यांकन भी बदलना होगा। प्रोटोटाइप, पिच, पोर्टफोलियो, पब्लिक डेमो और पीयर असेसमेंट जैसे तरीकों से ही रचनात्मकता और समस्या-समाधान की क्षमता को सही मायने में आंका जा सकता है।

नीति और सिस्टम पहले से समर्थन में

इस बदलाव के लिए नई नीति की जरूरत नहीं है। National Innovation and Startup Policy 2019 और Ministry of Education के Institution’s Innovation Councils पहले से ही इनोवेशन और स्टार्टअप कल्चर को बढ़ावा देने की बात करते हैं। यानी जो संस्थान आज कदम उठाते हैं, वे सिस्टम के खिलाफ नहीं, बल्कि उसी दिशा में आगे बढ़ते हैं।

कैंपस को बनाइए ‘लिविंग लैब’

इनोवेशन की शुरुआत घर से होनी चाहिए। कैंपस ऑपरेशन्स—ऊर्जा, पानी, कचरा, ट्रांसपोर्ट, सेवाएं—सब सीखने की प्रयोगशाला बन सकते हैं। जब छात्र अपने ही विश्वविद्यालय में बदलाव होते देखते हैं, तो इनोवेशन दिखावा नहीं, रोजमर्रा का काम बन जाता है।

आज बदलाव स्थायी है और निश्चितता दुर्लभ। ऐसे समय में विश्वविद्यालय या तो प्रतिक्रियात्मक बने रहेंगे, या फिर देश की सबसे भरोसेमंद ‘फ्यूचर फैक्टरी’ बनेंगे। जो संस्थान नवाचार को आदत बना लेंगे, वे सिर्फ बेहतर प्लेसमेंट नहीं देंगे, बल्कि ऐसे नागरिक और पेशेवर तैयार करेंगे जो अनिश्चित हालात में भी समाधान बना सकें, समुदायों को मजबूत कर सकें और अर्थव्यवस्था को ज्यादा लचीला बना सकें। शायद आज शिक्षा की सबसे व्यावहारिक परिभाषा यही है।

(लेखक एडइनबॉक्स में चीफ मेंटर हैं, टेक्नो इंडिया ग्रुप, कोलकाता में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और समूह से जुड़ी कोलकाता स्थित एक विश्वविद्यालय के प्रिंसिपल एडवाइज़र भी हैं।)

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