
भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली लंबे समय से एक बुनियादी चुनौती से जूझती रही है—जांच में देरी और साक्ष्यों की कमजोरी। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा 2029 तक हर राज्य में फोरेंसिक विश्वविद्यालय या केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशाला (CFSL) स्थापित करने की घोषणा केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार की दिशा में बड़ा हस्तक्षेप है। 30 हजार करोड़ रुपये के प्रस्तावित निवेश के साथ यह पहल संकेत देती है कि सरकार अब “सबूत आधारित न्याय” को नीति के केंद्र में लाना चाहती है।
आज की तारीख में जब अपराध के स्वरूप तेजी से बदल रहे हैं—साइबर क्राइम, डिजिटल फ्रॉड, संगठित अपराध और आतंकी गतिविधियां—तो पारंपरिक पुलिसिंग के भरोसे प्रभावी जांच संभव नहीं रह गई है। फोरेंसिक विज्ञान अब केवल एक सहायक उपकरण नहीं, बल्कि अपराध जांच की रीढ़ बन चुका है। ऐसे में सात से बढ़कर 15 केंद्रीय फोरेंसिक प्रयोगशालाओं की तैयारी और राज्यों में क्षेत्रीय लैब्स को मजबूत करने की योजना समय की मांग है।
इस पहल का सबसे अहम पक्ष फोरेंसिक शिक्षा और मानव संसाधन विकास से जुड़ा है। नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (NFSU) को जिस तरह से एक वैश्विक स्तर के संस्थान के रूप में विकसित किया जा रहा है, वह भारत की “नॉलेज पावर” बनने की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। 2029 तक 35 हजार छात्रों का अध्ययन, 100 प्रतिशत प्लेसमेंट, सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय समझौते और दर्जनों पेटेंट—ये आंकड़े बताते हैं कि फोरेंसिक साइंस अब एक सीमित विशेषज्ञता नहीं, बल्कि उभरता हुआ मेनस्ट्रीम करियर विकल्प है।
हालांकि, इस पूरी योजना की असली कसौटी ज़मीन पर इसके क्रियान्वयन में होगी। इमारतें और लैब्स बना देना पर्याप्त नहीं है। ज़रूरत है स्वतंत्र, पेशेवर और राजनीतिक दबाव से मुक्त फोरेंसिक संस्थानों की, जिनकी रिपोर्ट्स पर अदालतें बिना संदेह भरोसा कर सकें। साथ ही, राज्यों के पुलिस तंत्र और अभियोजन व्यवस्था को भी फोरेंसिक साक्ष्यों की सही समझ और उपयोग के लिए प्रशिक्षित करना होगा।
गृह मंत्री द्वारा घोषित “तीन साल में न्याय” का लक्ष्य तभी संभव है, जब फोरेंसिक रिपोर्ट्स समयबद्ध, विश्वसनीय और मानकीकृत हों। वरना तेज़ जांच का सपना कागज़ों तक ही सीमित रह जाएगा। फोरेंसिक ढांचे का विस्तार न्याय को तेज़ करने का साधन बन सकता है, लेकिन केवल तभी, जब गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
कुल मिलाकर, फोरेंसिक इंफ्रास्ट्रक्चर में यह निवेश भारत को न सिर्फ एक सशक्त न्याय प्रणाली की ओर ले जा सकता है, बल्कि देश को वैश्विक फोरेंसिक हब बनाने की क्षमता भी रखता है। सवाल अब यह नहीं है कि क्या यह ज़रूरी था, बल्कि यह है कि क्या हम इस मौके का सही और ईमानदार इस्तेमाल कर पाएंगे।




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