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शिक्षा में बढ़ती कमाई, घटती पहुँच: फीस आधारित ग्रोथ मॉडल कितनी दूर तक टिकेगा?

शिक्षा में बढ़ती कमाई, घटती पहुँच: फीस आधारित ग्रोथ मॉडल कितनी दूर तक टिकेगा?

क्रिसिल रेटिंग्स की ताज़ा रिपोर्ट भारत के शिक्षा क्षेत्र की चमकती तस्वीर पेश करती है। आने वाले दो वर्षों में 11–13% तक आय बढ़ने का अनुमान है। कारण साफ़ है—छात्रों के बढ़ते नामांकन और फीस में लगातार बढ़ोतरी। K-12 से लेकर इंजीनियरिंग और मेडिकल शिक्षा तक, लगभग हर सेगमेंट में मांग बनी हुई है। निजी संस्थान स्थिर कैश फ्लो और कम कर्ज़ के साथ वित्तीय रूप से मजबूत दिख रहे हैं।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह “ग्रोथ” वास्तव में शिक्षा की पहुँच बढ़ा रही है या सिर्फ संस्थानों के बैलेंस शीट को मज़बूत कर रही है?

फीस वृद्धि: माता-पिता की जेब पर सबसे भारी दबाव

रिपोर्ट बताती है कि शहरी इलाकों में बढ़ती महंगाई के चलते स्कूल लगातार फीस बढ़ा रहे हैं। आमदनी बढ़ने की इस प्रवृत्ति का सबसे सीधा असर मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ता है—उन पर जिनकी आय महंगाई की रफ्तार से मुकाबला करने में पहले ही हांफ रही है।

फीस बढ़ाना भले ही संस्थानों के लिए आसान रास्ता हो, लेकिन क्या यह शिक्षा को और महंगा नहीं बना रहा? खासकर निजी स्कूलों के K-12 सेगमेंट में 9–10% की सालाना आय वृद्धि का अनुमान उसी प्रवृत्ति को रेखांकित करता है।

ग्रोथ तो है, लेकिन खर्च भी बढ़ रहा है

शैक्षणिक संस्थानों की बढ़ती आमदनी के साथ खर्च भी तेज़ी से बढ़ रहा है— स्टाफ की सैलरी, प्रशासनिक लागत और नई कक्षाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर पर कैपेक्स। इन्हीं कारणों से ऑपरेटिंग मार्जिन 27–28% पर “स्थिर” बना रहने की बात कही गई है। यानी संस्थानों की कमाई भले बढ़े, लेकिन छात्रों या शिक्षकों के लिए समान अनुपात में सुधार की उम्मीद न के बराबर है।

मेडिकल और इंजीनियरिंग की मांग बढ़ी, लेकिन अवसर सीमित

रिपोर्ट का दूसरा बड़ा संकेत है— इंजीनियरिंग कोर्स की मांग वैश्विक मंदी के बावजूद बनी हुई है। मेडिकल कोर्सेज में मांग लगातार सप्लाई से ज़्यादा है। MBBS सीटों में बढ़ोतरी की सरकारी कोशिशों के बावजूद, एक सीट के लिए हजारों दावेदारों की स्थिति बनी हुई है। नर्सिंग, फार्मेसी और पैरामेडिकल कोर्सेज में मांग मध्यम है, जो स्वास्थ्य प्रणाली के लिए चिंता का विषय भी है क्योंकि यही कोर्सेज देश के हेल्थकेयर वर्कफोर्स की रीढ़ हैं।

वित्तीय रूप से सब ठीक, लेकिन क्या सामाजिक रूप से भी?

क्रिसिल की रिपोर्ट में सबसे अधिक राहत वाली बात है कि संस्थानों का कैश फ्लो मजबूत रहेगा और उन्हें बाहरी कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गियरिंग और इंटरेस्ट कवरेज रेशियो भी स्वस्थ हैं।

लेकिन इस वित्तीय मजबूती का फायदा किसे मिल रहा है? क्या इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल-कॉलेज खुल रहे हैं? क्या फीस में राहत मिल रही है? क्या क्वालिटी एजुकेशन सभी के लिए सुलभ हो रही है? इन सवालों के जवाब उतने उत्साहजनक नहीं हैं।

फीस आधारित विकास मॉडल का भविष्य

भारत में शिक्षा का निजीकरण तेज़ी से बढ़ा है। लेकिन इसकी कीमत पर भी चर्चा जरूरी है। डबल-डिजिट ग्रोथ दिखाने वाला सेक्टर तभी सफल माना जाएगा जब शिक्षा की गुणवत्ता और बदलाव में निवेश बढ़े, मिडिल क्लास और निम्न वर्ग पर आर्थिक बोझ कम हो, सरकारी संस्थानों को भी समान ध्यान मिले और शिक्षक और गैर-शैक्षणिक स्टाफ के लिए बेहतर वेतन और स्थिरता सुनिश्चित हो। 

सिर्फ कमाई बढ़ने से शिक्षा मजबूत नहीं होती। शिक्षा मजबूत तब होती है जब वह अधिक सुलभ, अधिक समान और अधिक गुणवत्तापूर्ण बनती है।

क्रिसिल की रिपोर्ट भारतीय शिक्षा क्षेत्र की “वित्तीय सेहत” का सकारात्मक संकेत देती है, लेकिन वह एक समानांतर वास्तविकता को भी उजागर करती है—शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है और इसकी सुलभता पर सबसे बड़ा दबाव गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है।  ग्रोथ के इस मॉडल को संतुलित करने की जरूरत है।

शिक्षा का उद्देश्य कमाई नहीं, क्षमता निर्माण होना चाहिए—और जब तक यह संतुलन नहीं बनेगा, इंडिया की शिक्षा प्रणाली में आर्थिक ग्रोथ और सामाजिक वास्तविकता के बीच यह अंतर बना रहेगा।

रईस अहमद 'लाली'

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