
भारत के पूर्वी तट पर बसे आंध्र प्रदेश के बंदरगाह शहर काकीनाडा में एक ऐसा प्रोजेक्ट आकार ले रहा है, जो देश की ऊर्जा नीति और वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा बाजार—दोनों की दिशा बदल सकता है। AM Green कंपनी द्वारा विकसित किया जा रहा यह ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट न सिर्फ दुनिया का सबसे बड़ा माना जा रहा है, बल्कि भारत को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़े निर्यातक के रूप में स्थापित करने की तैयारी भी कर रहा है।
करीब 10 अरब डॉलर, यानी लगभग 90 हजार करोड़ रुपये के निवेश से बनने वाला यह प्रोजेक्ट जलवायु परिवर्तन के खिलाफ भारत की रणनीति का अहम हिस्सा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पूरा होने के बाद भारत की पहचान केवल ऊर्जा उपभोक्ता की नहीं, बल्कि ऊर्जा समाधान देने वाले देश के रूप में भी होगी।
ग्रीन अमोनिया क्या है और क्यों है अहम
अब तक अमोनिया का उत्पादन मुख्य रूप से कोयला और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों से होता रहा है, जिससे भारी कार्बन उत्सर्जन होता है। इसके उलट ग्रीन अमोनिया पूरी तरह नवीकरणीय ऊर्जा—सौर और पवन—से तैयार किया जाता है।
इस प्रक्रिया में इलेक्ट्रोलाइज़र के जरिए पानी से हाइड्रोजन निकाली जाती है और हवा से नाइट्रोजन लेकर अमोनिया बनाई जाती है। खास बात यह है कि इसमें कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य होता है। ग्रीन अमोनिया का इस्तेमाल जहाजों के ईंधन, उर्वरक उद्योग और भविष्य में बिजली उत्पादन तक में किया जा सकता है।
तीन चरणों में तैयार होगा मेगा प्लांट
काकीनाडा में बनने वाला यह संयंत्र क्षमता के मामले में दुनिया के किसी भी मौजूदा ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट से आगे निकलने का लक्ष्य रखता है। कंपनी ने इसके लिए चरणबद्ध योजना बनाई है।
2027 में पहले चरण के तहत 5 लाख टन सालाना उत्पादन शुरू होगा।
2028 तक यह क्षमता बढ़कर 10 लाख टन हो जाएगी।
2030 तक संयंत्र 15 लाख टन प्रतिवर्ष की पूर्ण क्षमता पर पहुंच जाएगा, जिससे यह दुनिया का सबसे बड़ा ग्रीन अमोनिया प्लांट बन जाएगा।
24×7 स्वच्छ ऊर्जा का मजबूत ढांचा
इस परियोजना की खासियत इसका एकीकृत तकनीकी ढांचा है। अमोनिया उत्पादन के लिए बिजली केवल सौर या पवन ऊर्जा पर निर्भर नहीं रहेगी, बल्कि दोनों का संयुक्त मॉडल अपनाया जाएगा।
करीब 7.5 गीगावॉट सौर और पवन ऊर्जा क्षमता विकसित की जा रही है। इसके साथ ही लगभग 1,950 मेगावॉट की इलेक्ट्रोलाइज़र क्षमता लगाई जाएगी, जो हाइड्रोजन उत्पादन की रीढ़ होगी।
इसके अलावा, पम्प्ड-हाइड्रो स्टोरेज सिस्टम लगाया जा रहा है, जिससे संयंत्र को दिन-रात बिना रुकावट हरित ऊर्जा मिलती रहेगी। इसे भारत में अपनी तरह का पहला बड़ा प्रयोग माना जा रहा है।
वैश्विक बाजार में भारत की मजबूत एंट्री
इस प्रोजेक्ट का बड़ा हिस्सा निर्यात के लिए तैयार किया जा रहा है। जर्मनी, जापान और सिंगापुर जैसे देश, जो अपने कार्बन उत्सर्जन लक्ष्यों को लेकर दबाव में हैं, पहले ही भारत से ग्रीन अमोनिया की आपूर्ति को लेकर रुचि दिखा चुके हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे भारत वैश्विक ऊर्जा मूल्य श्रृंखला में अहम भूमिका निभा सकेगा। विदेशी मुद्रा आय बढ़ेगी और देश की छवि ऊर्जा आयातक से ऊर्जा निर्यातक के रूप में बदलेगी।
रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
काकीनाडा का यह प्रोजेक्ट केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। इसके निर्माण चरण में करीब 8,000 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलने की संभावना है।
प्लांट के संचालन के बाद लॉजिस्टिक्स, समुद्री सेवाओं और तकनीकी क्षेत्रों में हजारों कुशल नौकरियां पैदा होंगी। इससे आंध्र प्रदेश की स्थानीय अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक मजबूती मिलेगी।
सरकारी नीतियों से मिल रहा समर्थन
यह परियोजना केंद्र सरकार के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और आंध्र प्रदेश की इंटीग्रेटेड क्लीन एनर्जी पॉलिसी 2024 के अनुरूप है। 2030 तक 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में इसे एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
काकीनाडा का ग्रीन अमोनिया प्रोजेक्ट सिर्फ एक औद्योगिक निवेश नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और टिकाऊ भविष्य की नींव है। जब यह संयंत्र पूरी क्षमता से काम करेगा, तब दुनिया देखेगी कि कैसे भारत ने तकनीक, नीति और प्राकृतिक संसाधनों के सहारे वैश्विक ऊर्जा संकट का व्यावहारिक समाधान पेश किया है।




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