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अंडमान-निकोबार में ब्लू इकोनॉमी को नई रफ्तार, समुद्री प्रौद्योगिकी की कई अहम पहलों की शुरुआत

अंडमान-निकोबार में ब्लू इकोनॉमी को नई रफ्तार, समुद्री प्रौद्योगिकी की कई अहम पहलों की शुरुआत

अंडमान-निकोबार में ब्लू इकोनॉमी को नई रफ्तार, समुद्री प्रौद्योगिकी की कई अहम पहलों की शुरुआत

भारत की ब्लू इकोनॉमी को मजबूत बनाने की दिशा में केंद्र सरकार तेजी से कदम बढ़ा रही है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान के केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष के राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने मंगलवार को अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में समुद्री प्रौद्योगिकी से जुड़ी कई महत्वपूर्ण पहलों की शुरुआत की।

वे पोर्ट ब्लेयर स्थित अटल सेंटर फॉर ओशन साइंस एंड टेक्नोलॉजी फॉर आइलैंड्स (ACOSTI) के दौरे पर थे, जहां उन्होंने इन पहलों की समीक्षा भी की। इस कार्यक्रम का आयोजन पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) द्वारा किया गया।

भारत की अर्थव्यवस्था में समुद्री संसाधनों का बड़ा योगदान: डॉ. सिंह

वैज्ञानिकों, अधिकारियों और प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने के लिए भारत को अपने विशाल समुद्री संसाधनों का वैज्ञानिक उपयोग बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि ब्लू इकोनॉमी पर सरकार का फोकस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस सोच को दर्शाता है, जिसके अनुसार मुख्य भूमि के साथ द्वीप और तटीय क्षेत्रों का समान विकास आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि 2014 के बाद से सरकार ने उत्तर-पूर्व और द्वीप क्षेत्रों को विशेष प्राथमिकता दी है, जिसका असर आज इन क्षेत्रों में बढ़ती वैज्ञानिक और प्रशासनिक गतिविधियों में साफ दिखता है।

डीप ओशन मिशन से बढ़ी संभावनाएं

डॉ. सिंह ने डीप ओशन मिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि यह गौरव की बात है कि प्रधानमंत्री ने इसे लाल किले की प्राचीर से दो बार घोषित किया। यह दर्शाता है कि भारत समुद्री संसाधनों को लेकर कितनी दूरदर्शी नीति अपना रहा है।

उन्होंने कहा कि समुद्र में उपलब्ध कई संसाधन अभी तक कम खोजे गए हैं, जबकि भविष्य में ये भारत की आर्थिक मजबूती, रोजगार सृजन और निर्यात बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

समुद्री प्रौद्योगिकी की नई पहलें: केज कल्चर और समुद्री शैवाल खेती

कार्यक्रम में कई नई परियोजनाएं शुरू की गईं, जिनमें समुद्री मछलियों की ओपन-सी केज कल्चर, बड़े पैमाने पर समुद्री शैवाल (सीवीड) की खेती शामिल हैं। मंत्री ने कहा कि इन तकनीकों का स्थानीय जरूरतों और पर्यावरण के अनुसार अनुकूलन हो चुका है। इससे न सिर्फ स्थानीय आय बढ़ेगी बल्कि वोकल फॉर लोकल और लोकल फॉर ग्लोबल जैसे अभियानों को भी गति मिलेगी।

उन्होंने कहा कि अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह की अनूठी समुद्री प्रजातियां और तटीय परिस्थितियां इन परियोजनाओं के लिए बेहद अनुकूल हैं।

महासागर विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी का संगम

डॉ. सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि भारत उन चुनिंदा देशों में है जिनके पास जैव प्रौद्योगिकी के लिए समर्पित नीति — BioE3 (Economy, Environment and Employment) — मौजूद है।

उन्होंने कहा कि समुद्री जैव-संसाधन— प्लास्टिक के जैव-अनुकूल विकल्प, नई औषधीय यौगिक, उच्च मूल्य वाले बायो-प्रोडक्ट तैयार करने में मदद कर सकते हैं। इससे रोजगार और पर्यावरण संरक्षण दोनों को मजबूती मिलेगी।

वैश्विक बाजार में बढ़ती मांग, महिलाओं की भागीदारी पर जोर

मंत्री ने बताया कि गैर-पशु आधारित खाद्य उत्पाद, वैकल्पिक समुद्री पोषण और वेस्ट-टू-वेल्थ तकनीकों की वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है, खासकर यूरोप में।

उन्होंने कहा कि महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि ये परियोजनाएं लोगों की आय बढ़ाने के साथ सामाजिक सशक्तिकरण में भी योगदान दें।

अंडमान-निकोबार को ब्लू इकोनॉमी का प्रमुख केंद्र बनाने की तैयारी

अपने संबोधन के अंत में डॉ. सिंह ने स्थानीय वैज्ञानिकों और हितधारकों की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि CSIR और जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केंद्रों के सहयोग से अंडमान एवं निकोबार को भारत की ब्लू इकोनॉमी का एक रणनीतिक केंद्र बनाया जा सकता है।

सरकार ने आश्वासन दिया कि वह द्वीप क्षेत्रों के दीर्घकालिक वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

Asmita Sarkar

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