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अमेरिका में छात्र कर्ज का बढ़ता संकट: भारतीय परिवारों के लिए क्या है सबक?

अमेरिका में छात्र कर्ज का बढ़ता संकट: भारतीय परिवारों के लिए क्या है सबक?

अमेरिका में छात्र कर्ज का बढ़ता संकट: भारतीय परिवारों के लिए क्या है सबक?

अमेरिका में उच्च शिक्षा की कीमत और उससे जुड़ा छात्र कर्ज बीते वर्षों में बड़ी सामाजिक समस्या बन चुका है। नेशनल सेंटर फॉर एडुकेशन स्टैटिस्टिक्स (NCES) के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका के निजी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले 61% से 83% छात्र कर्ज लेते हैं। निजी व सरकारी सहायता वाले संस्थानों में यह प्रतिशत 54% से 61% के बीच है, जबकि पब्लिक इंस्टीट्यूशंस में भी 33% से 49% छात्रों को कर्ज का सहारा लेना पड़ता है। हर साल यह भार लगातार बढ़ रहा है और इसकी कुल राशि अब अरबों डॉलर तक पहुंच चुकी है।

छात्रों पर बढ़ता बोझ

पिछले वर्ष उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में प्रति छात्र औसत शिक्षा ऋण लगभग 39,375 डॉलर था—जो 2007 की तुलना में करीब तीन गुना अधिक है।

खासकर मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे इस बोझ से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। मैरीलैंड, जॉर्जिया और वर्जीनिया जैसे राज्यों में छात्रों पर कर्ज का दबाव और ज्यादा है।

अमेरिका में अधिकतर छात्र अपनी पढ़ाई के लिए लिए गए कर्ज को चुकाने में 35 से 49 वर्ष की उम्र तक उलझे रहते हैं। यानी जीवन का बड़ा हिस्सा किस्तें भरने में गुजर जाता है। उच्च ब्याज दरें इस दबाव को और बढ़ा देती हैं।

विदेशों में काम करने वाले कई अमेरिकी भी इस बोझ से जूझते हैं। जिनेवा में काम करने वाले एक अमेरिकी ने बताया कि पचास वर्ष की उम्र पार करने के बावजूद वह अपनी शिक्षा का कर्ज अभी तक चुका रहा है, क्योंकि आय इतनी नहीं कि परिवार और कर्ज दोनों संभाल सके।

कर्ज चुकाने में दशकों लग जाते हैं

अमेरिका में छात्र ऋण को चुकाने की सामान्य अवधि 10 से 30 वर्ष तक मानी जाती है।

यही कारण है कि कई युवा स्कूल के बाद उच्च शिक्षा से पीछे हट जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इतनी महंगी पढ़ाई और ऊंची ब्याजदर का बोझ वहन करना संभव नहीं होगा। ऐसी स्थिति में वे जल्दी किसी नौकरी या छोटे-मोटे काम में लग जाते हैं।

एआई के कारण नौकरी संकट और बढ़ी मुश्किलें

पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम मेधा (AI) तेजी से बढ़ने के कारण अमेरिकी नौकरी बाजार पर भी दबाव बढ़ा है। कई बड़ी कंपनियों ने हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाला है। नौकरी मेलों में गैर-अमेरिकी नागरिकों से पहला सवाल यही पूछा जा रहा है—क्या आप अमेरिकी नागरिक हैं? ‘न’ कहते ही अधिकांश का बायोडाटा बिना देखे लौटा दिया जाता है। कई ऐसे युवा, जिन्होंने अमेरिका में महंगी पढ़ाई की और कर्ज लिया, आज रोजगार न मिलने के कारण किस्तें चुकाने में असमर्थ हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति रही, तो समय दूर नहीं जब अमेरिका में बच्चे उच्च शिक्षा को लेकर अधिक हिचकिचाने लगेंगे। इससे विश्वविद्यालयों की आय पर असर पड़ेगा और कर्ज देने वाली कंपनियों के सामने भी संकट खड़ा होगा।

भारत और अमेरिका: दो अलग सोच

भारतीय और अमेरिकी समाज की सोच में बड़ा फर्क यहां दिखता है। भारत में परिवार बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता देता है। माता-पिता अपनी बचत, जमीन-जायदाद और संसाधन तक लगा देते हैं ताकि बच्चों की पढ़ाई कहीं रुक न जाए। जरूरत पड़ने पर कर्ज भी लेते हैं, लेकिन उसकी जिम्मेदारी खुद उठाते हैं। भारत में आज भी कई परिवारों में तीन पीढ़ियां साथ रहती हैं। संकट के समय परिवार ही सहारा बनता है।

इसके उलट पश्चिमी देशों में ‘अकेलेपन’ को स्वतंत्रता का प्रतीक मानकर पेश किया जाता है। वहां युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक, सभी अपनी-अपनी जिंदगी अलग जीते हैं।

देखभाल के लिए परिवार की जगह केयर इकॉनमी जैसे मॉडल पर निर्भरता बढ़ गई है।

अमेरिका में परिवारों के महत्व को स्वीकारने की कोशिश पहले भी हुई है—जैसे 1993 में अल गोर की पत्नी द्वारा चलाया गया ‘फैमिली वैल्यूज़’ कैंपेन या डोनाल्ड ट्रंप के भाषण—लेकिन सामाजिक ढांचे में आई दूरियां वापस जुड़ नहीं पाईं।

भारतीय समाज के लिए संकेत

अमेरिका में छात्र ऋण और परिवार संरचना की स्थिति भारतीय समाज को एक महत्वपूर्ण सीख देती है— परिवार एक ऐसी ताकत है, जो आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों के समय भी साथ खड़ी रहती है। उच्च शिक्षा का बढ़ता खर्च भारत में भी चिंता का विषय है, लेकिन यहां परिवार की भूमिका अब भी एक बड़ा सहारा है।अमेरिका की मौजूदा स्थिति बताती है कि शिक्षा को केवल बाज़ार की वस्तु बनाना और परिवार के महत्व को कम करना लंबे समय में समाज पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

एडइनबॉक्स टीम

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