
सर्दियों में अब भारी जैकेट या इलेक्ट्रिक हीटर पर पूरी तरह निर्भर रहने की जरूरत कम हो सकती है। भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीकों पर काम तेज कर दिया है, जो आने वाले समय में रोजमर्रा की जिंदगी को ज्यादा आसान और सुरक्षित बनाएंगी। इसी कड़ी में IIT बॉम्बे, IISER तिरुअनंतपुरम और IIT इंदौर ने दो अलग-अलग क्षेत्रों में बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धियां दर्ज की हैं।
सूरज की रोशनी से चार्ज होने वाली हल्की थर्मल बैटरी
IIT बॉम्बे और IISER तिरुअनंतपुरम के शोधकर्ताओं ने मिलकर एक पतली, हल्की और कपड़े जैसी वियरेबल थर्मल बैटरी विकसित की है। यह बैटरी सूरज की रोशनी को सोखकर गर्मी के रूप में संग्रहित करती है और जब मौसम ठंडा होता है या सूरज नहीं होता, तब यह धीरे-धीरे गर्मी छोड़ती है।
इस तकनीक की सबसे खास बात है कि यह बिजली, तार या किसी भारी उपकरण के बिना काम करती है। इसे सामान्य कपड़ों की तरह पहना जा सकता है और यह कई बार चार्ज व डिस्चार्ज होने के बाद भी स्थिर रहती है।
कैसे काम करती है यह नई तकनीक?
वैज्ञानिकों ने एक विशेष पॉलिमर संयोजन बनाया है जो गर्मी को सुरक्षित रूप से संग्रहित और रिलीज करने में सक्षम है। इस पॉलिमर में पॉलीएथिलीन ग्लाइकोल (PEG), जो गर्मी को सहेजता है और पॉलीस्टाइरीन को-एलाइल अल्कोहल (PSAA), जो संरचना को मजबूती देता है—इन दोनों को जोड़ा गया है। जब तापमान बढ़ता है, तो PEG के हिस्से आंशिक रूप से पिघलते हैं लेकिन पूरा पदार्थ ठोस रहता है। यही प्रक्रिया इसे सुरक्षित और लंबे समय तक उपयोग के योग्य बनाती है।
इसके साथ ग्राफीन ऑक्साइड मिलाया गया है, जिससे सूरज की रोशनी सीधे ऊष्मा में बदल जाती है और थर्मल बैटरी जल्दी चार्ज हो जाती है। यह तकनीक भविष्य में विंटर वेयर, आउटडोर गियर, डिफेंस यूनिफॉर्म और डिजास्टर रिलीफ जैसी जरूरतों में बड़ा बदलाव ला सकती है।
IIT इंदौर का ‘डिजिटलट्विन’: इंसानी शरीर का एआई मॉडल
दूसरी ओर, IIT इंदौर ने स्वास्थ्य क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण तकनीक विकसित की है। संस्थान ने इंसानी शरीर जैसा दिखने वाला ‘डिजिटलट्विन’ मॉडल तैयार किया है, जो सांस लेता है, पलकें झपकाता है और शरीर के अंदर बीमारी के असर को भी दिखा सकता है।
यह एआई आधारित मॉडल डॉक्टरों को बीमारियों की शुरुआती पहचान, उनके फैलाव को समझने, दवाओं और उपचार के परीक्षण में मदद करेगा। अभी इसका पहला संस्करण फेफड़ों के डिजिटल ट्विन के रूप में तैयार किया गया है। भविष्य में यह तकनीक कई अन्य अंगों के लिए भी विकसित की जा सकती है, जिससे मेडिकल साइंस में निदान और रिसर्च दोनों में नए रास्ते खुलेंगे।
कहां हुआ प्रदर्शन?
इस ‘डिजिटलट्विन’ को हाल ही में रीजनल एआई इम्पैक्ट कॉन्फ्रेंस 2026, भोपाल में प्रदर्शित किया गया। इसे IIT इंदौर के दृष्टि CPS सेंटर ने विकसित किया है, जो डिजिटल और साइबर-फिजिकल तकनीकों पर शोध करता है।




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