
दुनिया अब ‘वाटर स्ट्रेस’ (जल तनाव) से आगे बढ़कर ‘ग्लोबल वाटर बैंकरप्सी’ (वैश्विक जल दिवालियापन) के युग में प्रवेश कर गई है। जापान की राजधानी में स्थित संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (यूएनवी) के इंस्टीट्यूट फॉर वॉटर, एनवायरनमेंट एंड हेल्थ की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, इंसान मीठे पानी के स्रोतों का इस कदर दोहन कर रहा है कि अब उनका उबरना नामुमकिन सा हो गया है।
संयुक्त राष्ट्र पहले ‘जल संकट’ जैसे शब्दों का उपयोग करता था, जिसमें सुधार की गुंजाइश होती थी। लेकिन ‘बैंकरप्सी’ शब्द का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया गया है कि हमने अपनी जमापूंजी (भूजल और प्राकृतिक जलाशय) को पूरी तरह लुटा दिया है। झीलों पर निर्भर एक-चौथाई आबादी उन जलाशयों से पानी ले रही है, जिनका आधा पानी 1990 के बाद गायब हो चुका है।
झील से ग्लेशियर तक पानी और बर्फ में कमी
सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 के बाद से दुनिया की 50% से ज्यादा बड़ी झीलों में पानी कम हो गया है। भूजल के 70% स्रोत भी घट चुके हैं। वहीं, Wetlands यानी दलदली जमीन और जल क्षेत्र पिछले 50 वर्षों में लगभग यूरोपीय संघ के आकार के बराबर सूख चुके हैं। ग्लेशियरों की स्थिति भी चिंताजनक है; 1970 के बाद से वे लगभग 30% सिकुड़ चुके हैं।
संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के निदेशक कावेह मदानी का कहना है कि दुनिया के अधिकांश हिस्सों के लिए “सामान्य” अब खत्म हो गया है। उनका मानना है कि जल दिवालियापन का बोझ छोटे किसान, स्वदेशी लोग, कम आय वाले शहरी निवासी, महिलाएं और युवा पर सबसे ज्यादा पड़ता है, जबकि अत्यधिक उपयोग का लाभ अक्सर अधिक शक्तिशाली लोगों को मिलता है।
‘डे जीरो’ की ओर बढ़ रहे दुनिया के शहर
रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया के कई शहर ‘डे जीरो’ की ओर बढ़ रहे हैं, जहां म्युनिसिपल वाटर सिस्टम पूरी तरह ठप हो सकता है। ईरान की राजधानी तेहरान में पानी की इतनी कमी है कि राजधानी को कहीं और स्थानांतरित करने या शहर को खाली करने की नौबत आ सकती है।
पानी की कमी के कारण लैटिन अमरीका, दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका में बड़े पैमाने पर पलायन होने की संभावना है। वहीं, नीति आयोग और विभिन्न शोधों के अनुसार भारत में बेंगलूरु, चेन्नई और दिल्ली जैसे महानगर ‘डे जीरो’ के सबसे करीब हैं, जहां अनियंत्रित शहरीकरण और भूजल के अत्यधिक दोहन ने जल प्रणालियों को पतन की कगार पर पहुंचा दिया है।
जलवायु परिवर्तन और कुप्रबंधन की मार
खेती और बढ़ता तापमान पौधों की प्यास बढ़ा रहे हैं, जिससे सिंचाई के लिए और अधिक पानी की जरूरत पड़ रही है। साथ ही, प्रदूषण और कचरे ने बचे हुए पानी को भी उपयोग के लायक नहीं छोड़ा है। रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि अभी वैश्विक निगरानी ढांचा तैयार नहीं किया गया, तो अच्छी बारिश के दिनों में भी हम पानी के लिए संघर्ष करते रहेंगे। लगातार भूजल दोहन, जंगलों की कटाई, भूमि क्षरण और प्रदूषण ने जल स्रोतों को स्थायी नुकसान पहुंचाया है। जलवायु परिवर्तन ने इस आग में घी डालने का काम किया है।
प्यासी होती दुनिया
– तीन-चौथाई आबादी उन देशों में जहां पानी की आपूर्ति असुरक्षित या गंभीर रूप से असुरक्षित है।
– आधी आबादी अपनी जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है, जो तेजी से खत्म हो रहा है।
– चार अरब लोग साल में कम से कम एक महीना भीषण जल संकट का सामना करते हैं।




Add comment