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एल्गोरिदम और नई पीढ़ी: जब स्क्रीन तय करने लगे ज्ञान की दिशा

एल्गोरिदम और नई पीढ़ी: जब स्क्रीन तय करने लगे ज्ञान की दिशा

एल्गोरिदम और नई पीढ़ी: जब स्क्रीन तय करने लगे ज्ञान की दिशा

आज का दौर तकनीक का है और इसकी सबसे शांत लेकिन सबसे प्रभावशाली शक्ति है एल्गोरिदम। यह वह अदृश्य तंत्र है, जो तय करता है कि हम इंटरनेट पर क्या देखें, क्या पढ़ें और किस जानकारी तक पहुंचें। सोशल मीडिया, सर्च इंजन और वीडियो प्लेटफॉर्म पर दिखाई देने वाली सामग्री किसी संयोग का नतीजा नहीं होती, बल्कि उन गणनात्मक प्रक्रियाओं से छनकर आती है, जिनकी कार्यप्रणाली आम उपयोगकर्ता के लिए लगभग अदृश्य है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने लोगों के हाथ में अभूतपूर्व ताकत दी है, लेकिन इसके साथ एक ऐसा जोखिम भी जुड़ा है, जिसने ज्ञान की धारा और सोचने के तरीके को धीरे-धीरे बदलना शुरू कर दिया है।

युवा और बच्चे आज सूचना के विशाल संसार में मौजूद हैं, लेकिन उन्हें जो जानकारी मिल रही है, वह उसी सीमित दायरे में सिमटी होती है, जिसे तकनीक उनके लिए तय करती है। उन्हें लगता है कि वे खुद जानकारी खोज रहे हैं, जबकि असल में वे एक ऐसे डिजिटल रास्ते पर चल रहे होते हैं, जिसकी दिशा पहले से तय होती है। यह स्थिति इसलिए ज्यादा चिंता पैदा करती है क्योंकि नई पीढ़ी स्क्रीन पर दिखने वाली जानकारी को अक्सर अंतिम सत्य मान लेती है। पहले किसी तथ्य की पुष्टि के लिए किताबें, शोध और विशेषज्ञों की जरूरत पड़ती थी, अब गूगल सर्च, यूट्यूब वीडियो या रील ही कई बार ‘सबूत’ माने जाने लगे हैं।

गलत जानकारी के खतरों का एक गंभीर उदाहरण ईरान में देखने को मिला था। महामारी के शुरुआती दौर में वहां यह अफवाह फैली कि शराब पीने से वायरस मर जाता है। इस भ्रम के चलते कई लोगों ने जहरीली मिथाइल अल्कोहल का सेवन कर लिया, जिससे मौतें हुईं और कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गई। यह घटना बताती है कि जब भ्रामक सूचना बड़े पैमाने पर फैलती है, तो उसका असर केवल सोच पर नहीं, बल्कि सीधे मानव जीवन पर पड़ता है।

दरअसल, सोशल मीडिया के एल्गोरिदम इस तरह बनाए जाते हैं कि वे उपयोगकर्ता को वही सामग्री दिखाएं, जो उसकी पिछली पसंद और व्यवहार से मेल खाती हो। अगर कोई व्यक्ति किसी मुद्दे पर एकतरफा जानकारी देखता है, तो मंच उसे उसी तरह की और सामग्री दिखाने लगता है। धीरे-धीरे यह भ्रम बनने लगता है कि पूरी दुनिया उसी तरह सोच रही है, जैसा स्क्रीन पर दिखाई देता है। इससे अलग राय, असहमति और विविध दृष्टिकोण हमारे सामने आ ही नहीं पाते।

बच्चों के मामले में यह समस्या और गंभीर हो जाती है। उनका मन अभी विकसित हो रहा होता है और वे तथ्य तथा राय के अंतर को समझने की प्रक्रिया में होते हैं। यह उम्र तर्क, विवेक और विश्लेषण सीखने की होती है, लेकिन डिजिटल मंच अक्सर उन्हें गहराई से सोचने के बजाय केवल तेज और सतही सामग्री का उपभोक्ता बना देते हैं। लंबे लेखों की जगह छोटे वीडियो और रील्स उनकी प्राथमिकता बन जाती हैं। इससे धैर्य कम होता है और ‘तुरंत ज्ञान’ की आदत बन जाती है, जो असल में ज्ञान नहीं बल्कि सूचना की लत है।

एल्गोरिदम का एक और असर यह है कि वह हमें उन विचारों से दूर रखता है, जो हमारी सोच को चुनौती दे सकते हैं। स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति और विविध मतों की अहम भूमिका होती है, लेकिन डिजिटल मंचों पर हम अक्सर वही देखते हैं, जो हमें सहज और सुखद लगता है। असुविधाजनक सच और चुनौतीपूर्ण सवाल धीरे-धीरे हमारी स्क्रीन से गायब हो जाते हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु का काम केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि शिष्य की चेतना को जागृत करना रहा है। इसके उलट, आज एल्गोरिदम एक ऐसे मौन गुरु की तरह काम कर रहा है, जो सवाल पूछने की आदत नहीं डालता, बल्कि तैयार जवाब परोस देता है। परीक्षा की तैयारी से लेकर करियर के फैसलों तक, छात्र कई बार कुछ वीडियो देखकर ही मान लेते हैं कि वही सही रास्ता है। स्वास्थ्य, इतिहास और विज्ञान जैसे गंभीर विषय भी अब ‘दो मिनट के ज्ञान’ में सिमटते जा रहे हैं।

यह भी समझना जरूरी है कि एल्गोरिदम केवल उपयोगकर्ता की पसंद से नहीं चलता। इसके पीछे विज्ञापन, बाजार और कॉरपोरेट हित भी काम करते हैं। किसी उत्पाद, विचार या एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में जानकारी की निष्पक्षता कमजोर होती है और युवा अनजाने में प्रचारित विचारों को ही आगे बढ़ाने लगते हैं।

आज सोशल मीडिया केवल संवाद का मंच नहीं, बल्कि सोच और राय को आकार देने वाली ताकत बन चुका है। सच और भ्रम, तथ्य और अफवाह के बीच की रेखा लगातार धुंधली हो रही है। ऐसे समय में डिजिटल साक्षरता को केवल तकनीक चलाने की क्षमता तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसका मतलब है आलोचनात्मक सोच, स्रोतों की जांच और जानकारी की सत्यता को परखने की समझ।

स्कूलों और समाज दोनों स्तरों पर बच्चों और युवाओं को यह सिखाने की जरूरत है कि इंटरनेट पर दिखने वाली हर चीज ज्ञान नहीं होती। अलग-अलग दृष्टिकोण पढ़ना, किताबों और विश्वसनीय स्रोतों की ओर लौटना और विशेषज्ञों से संवाद करना आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है। स्क्रीन के उस पार की दुनिया जितनी आकर्षक है, उतनी ही भ्रामक भी है। अगर समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो तकनीक हमारे लिए साधन नहीं, बल्कि हमारी सोच को नियंत्रित करने वाली शक्ति बनकर रह जाएगी।

Asmita Sarkar

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