
अमेरिका में एक बड़े घटनाक्रम ने राजनीतिक और शैक्षणिक हलकों में हलचल मचा दी है। पेंटागन ने आधिकारिक तौर पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के साथ अपने सभी संबंध खत्म करने की घोषणा कर दी है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले शैक्षणिक सत्र से वह हार्वर्ड में चल रहे सभी सैन्य प्रशिक्षण, फेलोशिप और सर्टिफिकेट कार्यक्रम बंद कर देगा। इस फैसले ने न सिर्फ विश्वविद्यालय प्रशासन को चौंकाया है, बल्कि हजारों छात्रों के बीच भी चिंता बढ़ा दी है।
पेंटागन का यह कठोर फैसला अचानक नहीं आया। पिछले कुछ वर्षों से ट्रंप प्रशासन और हार्वर्ड के बीच कई मुद्दों पर टकराव चल रहा था। व्हाइट हाउस लगातार यह आरोप लगाता रहा कि हार्वर्ड कैंपस यहूदी-विरोधी भावनाओं को रोकने में नाकाम रहा है और विश्वविद्यालय में ‘कट्टरपंथी विचारधाराओं’ को बढ़ावा मिल रहा है। इसी पृष्ठभूमि में रक्षा विभाग ने माना कि हार्वर्ड अब सैन्य जरूरतों और प्रोफ़ेशनल ट्रेनिंग की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पा रहा।
अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने बयान देते हुए कहा कि विभाग वर्षों से अपने शीर्ष सैन्य अधिकारियों को हार्वर्ड भेजता रहा, इस उम्मीद में कि विश्वविद्यालय उनके नेतृत्व और रणनीतिक सोच को मजबूत करेगा। लेकिन उनके अनुसार, कई अधिकारी वहां से लौटकर “ग्लोबलिस्ट और कट्टरपंथी विचारों” से प्रभावित हुए, जो सैन्य इकाइयों की क्षमताओं को नुकसान पहुंचाते हैं। हेगसेथ ने सोशल मीडिया पोस्ट में यह भी लिखा कि “हार्वर्ड वोक है, युद्ध विभाग नहीं,” और इसी वजह से 2026–27 से सभी कार्यक्रम बंद किए जाएंगे। हालांकि वर्तमान में हार्वर्ड में पढ़ रहे सैन्य अधिकारी अपने कोर्स पूरे कर सकेंगे।
हार्वर्ड और ट्रंप प्रशासन के बीच तनातनी नई नहीं है। ट्रंप के कार्यकाल के दौरान विश्वविद्यालय को कई बार केंद्र सरकार की नाराजगी का सामना करना पड़ा। प्रशासन ने संघीय रिसर्च फंडिंग में भारी कटौती की, और विदेशी छात्रों के नामांकन पर भी रोक लगाने की कोशिश की गई। हाल ही में, व्हाइट हाउस ने खुले तौर पर कहा कि हार्वर्ड कैंपस पर यहूदी-विरोधी पूर्वाग्रहों को सहन करने की वजह से उसे “जवाबदेह” बनाया जा रहा है।
पेंटागन के इस निर्णय ने अमेरिका में शिक्षा, राजनीति और सैन्य संबंधों पर एक नई बहस छेड़ दी है। जहां एक वर्ग इसे राजनीतिक हस्तक्षेप मान रहा है, वहीं दूसरा इसे सैन्य ताकत और विचारधारा की रक्षा के लिए जरूरी कदम बता रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह कदम अन्य विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों के बीच संबंधों को कैसे प्रभावित करता है।




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