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आईआईटी दिल्ली का कमाल: नया एसी करेगा 33% तक बिजली की बचत, गर्मी में देगा ज्यादा राहत

आईआईटी दिल्ली का कमाल: नया एसी करेगा 33% तक बिजली की बचत, गर्मी में देगा ज्यादा राहत

आईआईटी दिल्ली का कमाल: नया एसी करेगा 33% तक बिजली की बचत, गर्मी में देगा ज्यादा राहत

Indian Institute of Technology Delhi के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिक एक नए प्रकार के उच्च दक्षता वाले एयर कंडीशनर पर काम कर रहे हैं, जिसने परीक्षण के दौरान बिजली खपत में लगभग एक-तिहाई कमी दिखाने की क्षमता साबित की है।

तेजी से बढ़ती गर्मी और हीट स्ट्रेस के कारण स्वास्थ्य जोखिम बढ़ रहे हैं और कार्य क्षमता भी प्रभावित हो रही है। ऐसे हालात में कूलिंग की मांग लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2019 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी India Cooling Action Plan के अनुसार, तापमान में बढ़ोतरी और घरों व दफ्तरों में एयर कंडीशनर के बढ़ते उपयोग के चलते वर्ष 2037-38 तक कूलिंग के लिए बिजली की खपत तीन गुना तक बढ़ सकती है।

इसी चुनौती से निपटने के लिए आईआईटी दिल्ली की शोध टीम ऊर्जा बचाने वाले नए एसी सिस्टम का विकास कर रही है। प्रोफेसर अनुराग गोयल के नेतृत्व में, और मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के शोध छात्र अनंतकृष्णन के साथ मिलकर, टीम ने इस नई तकनीक का प्रयोगशाला स्तर का प्रोटोटाइप तैयार किया है। इस सिस्टम ने लगभग 33 प्रतिशत तक बिजली बचत की क्षमता दिखाई है।

पारंपरिक एसी से अलग नई तकनीक

आज इस्तेमाल होने वाले वेपर-कंप्रेशन आधारित एसी हवा को जरूरत से ज्यादा ठंडा करके नमी हटाते हैं, जिससे ऊर्जा की अधिक खपत होती है। प्रोफेसर अनुराग गोयल की टीम ने एक नया कॉम्पैक्ट ऐड-ऑन मॉड्यूल विकसित किया है, जो सीधे हवा में मौजूद नमी को नियंत्रित करता है।

इस मॉड्यूल में नमक के घोल (लिक्विड डेसिकेंट) का उपयोग किया जाता है, जो बाहर से आने वाली हवा में मौजूद जलवाष्प को सोख लेता है। हवा और नमक के घोल के बीच एक पतली और चयनित पॉलिमर मेम्ब्रेन लगाई गई है, जो नमक को भवन के अंदर की हवा में जाने से रोकती है। यह समस्या पहले के लिक्विड डेसिकेंट सिस्टम में देखी जाती थी।

फेंकी हुई गर्मी का दोबारा उपयोग

जब नमक का घोल नमी सोख लेता है, तो उसे दोबारा इस्तेमाल के लिए सुखाना जरूरी होता है। शोध टीम ने इसके लिए एक अभिनव सिस्टम इंटीग्रेशन मॉडल तैयार किया है। इस डिजाइन में अलग से बर्नर या इलेक्ट्रिक हीटर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। एसी के कंडेंसर (बाहरी यूनिट) से निकलने वाली अतिरिक्त गर्मी को ही रीजेनरेटर मॉड्यूल की ओर मोड़कर नमक के घोल को दोबारा सुखाया जाता है।

इस तरह ऊर्जा का बेहतर उपयोग करते हुए सिस्टम लगातार काम कर सकता है। वेपर कंप्रेशन और डेसिकेंट मॉड्यूल के बीच ऊर्जा ट्रांसफर को संतुलित रखकर यह हाइब्रिड सिस्टम समान इनडोर आराम स्तर बनाए रखते हुए करीब 33 प्रतिशत कम बिजली खपत करता है।

प्रोफेसर अनुराग गोयल के अनुसार, भारत के विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में अनुमानित ऊर्जा बचत 28 प्रतिशत (अत्यधिक आर्द्र क्षेत्रों में) से लेकर 41.5 प्रतिशत (शुष्क और रेगिस्तानी इलाकों में) तक हो सकती है।

टिकाऊ कूलिंग की दिशा में बड़ा कदम

शोध टीम का मानना है कि भारत जैसे देश में, जहां कूलिंग की मांग तेजी से बढ़ रही है, इस तरह की टिकाऊ और ऊर्जा-कुशल तकनीक का व्यापक उपयोग किया जा सकता है। यह न केवल बिजली बिल कम करेगी, बल्कि पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव डालेगी।

इस शोध पर आधारित अध्ययन ‘Model-based analysis of a novel hybrid membrane-liquid desiccant air conditioner for high-efficiency space cooling’ शीर्षक से Journal of Building Engineering में प्रकाशित हो चुका है।

यह नवाचार भारत में ऊर्जा दक्ष कूलिंग समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

Asmita Sarkar

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