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गोबर और फ्लाई ऐश से बनी ‘ग्रीन ईंट’: एएमयू की नई खोज से सस्ता और ठोस निर्माण संभव

गोबर और फ्लाई ऐश से बनी ‘ग्रीन ईंट’: एएमयू की नई खोज से सस्ता और ठोस निर्माण संभव

गोबर और फ्लाई ऐश से बनी ‘ग्रीन ईंट’: एएमयू की नई खोज से सस्ता और ठोस निर्माण संभव

Aligarh Muslim University (AMU) की एक नई खोज भारतीय निर्माण उद्योग में बड़ा बदलाव ला सकती है। विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने गोबर, फ्लाई ऐश, चूना और थोड़ी मिट्टी के मिश्रण से एक पर्यावरण–हितैषी ग्रीन ईंट तैयार की है, जो पारंपरिक ईंटों की तुलना में लगभग आधी कीमत पर बनती है और तापमान संतुलित रखने की क्षमता भी रखती है।

बाजार में जहां सामान्य ईंट की कीमत करीब 8 रुपये तक पहुंच जाती है, वहीं AMU की यह ग्रीन ईंट लगभग 4 रुपये में तैयार हो जाती है। वजन के मामले में भी यह काफी हल्की है। पारंपरिक ईंट जहां करीब 2.5 किलोग्राम की होती है, वहीं यह नई ईंट सिर्फ 900 ग्राम की है। हल्का वजन होने से भवन की संरचना पर कम दबाव पड़ता है, जिससे पिलर और नींव पर बोझ घटता है।

इस तकनीक की मजबूती को देखते हुए विश्वविद्यालय ने इसका पेटेंट भी हासिल कर लिया है और अब उत्पादन के लिए निजी कंपनियों से करार की तैयारी चल रही है।

सिविल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर Mehmood Anwar के अनुसार, इन ईंटों को पारंपरिक ईंटों की तरह भट्ठे में पकाने की जरूरत नहीं होती। इन्हें सांचों में ढालकर धूप और हवा में सुखाया जाता है। इससे धुआं नहीं निकलता और उपजाऊ मिट्टी की बर्बादी भी नहीं होती।

प्रो. अनवर बताते हैं कि 25% गोबर, 60% फ्लाई ऐश, 5% चूना और 10% मिट्टी का मिश्रण सबसे बेहतर परिणाम देता है। प्रयोगशाला परीक्षणों में इस ईंट की कंप्रेसिव स्ट्रेंथ 16.5 एमपीए पाई गई, जो पारंपरिक ईंटों के बराबर या उससे बेहतर मानी जाती है। जल अवशोषण दर 12.7% से 17.2% के बीच दर्ज की गई, जो निर्माण मानकों के अनुरूप है।

इस ग्रीन ईंट की एक बड़ी खासियत इसका थर्मल इंसुलेशन है। इससे बने घरों में सर्दियों में गर्माहट और गर्मियों में ठंडक बनी रहती है, जिससे ऊर्जा की बचत भी संभव है।

यह तकनीक औद्योगिक कचरे फ्लाई ऐश और कृषि अपशिष्ट गोबर का उपयोग कर पर्यावरण को दोहरा लाभ देती है। प्रदूषण कम करने के साथ-साथ यह निर्माण लागत घटाने में भी सहायक है। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में कम लागत वाले आवास निर्माण के लिए यह एक कारगर विकल्प बन सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इस तरह की ईको–फ्रेंडली तकनीकों को बढ़ावा देती है, तो सस्ते आवास निर्माण के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

Asmita Sarkar

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