
भारत से हर साल हजारों छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर विदेशों के मेडिकल कॉलेजों का रुख करते हैं। लेकिन अब ऐसे छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण नियम सामने आया है। नई दिल्ली स्थित National Medical Commission (NMC) ने स्पष्ट कर दिया है कि विदेशों से एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान केवल ऑनलाइन माध्यम से की गई शिक्षा को मान्यता नहीं दी जाएगी।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग ने सभी राज्यों के स्वास्थ्य विभागों, मेडिकल कॉलेजों और चिकित्सा शिक्षा से जुड़े अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी किए हैं। आयोग का कहना है कि मेडिकल शिक्षा केवल किताबों और ऑनलाइन क्लास से पूरी नहीं हो सकती। इसमें क्लिनिकल अनुभव और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग बेहद जरूरी है, इसलिए पूरी पढ़ाई ऑनलाइन करने वाले छात्रों को भारत में सीधे मान्यता नहीं मिलेगी।
एनएमसी के सचिव डॉ. राघव लैंगर ने आदेश में कहा है कि अगर किसी छात्र ने विदेश में पढ़ाई के दौरान किसी अवधि में ऑनलाइन कक्षाएं की हैं, तो उसे उस अवधि के बराबर समय तक ऑफलाइन प्रशिक्षण और क्लिनिकल प्रैक्टिस करनी होगी। यानी छात्र को मेडिकल कॉलेज या अस्पताल में वास्तविक प्रशिक्षण लेकर उस कमी को पूरा करना होगा।
आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि पढ़ाई की अवधि को कम करके इस कमी को पूरा नहीं किया जा सकता। उदाहरण के तौर पर अगर किसी छात्र की पढ़ाई के दौरान कुछ महीने ऑनलाइन कक्षाएं चली थीं, तो उसे उतने ही समय की अतिरिक्त ऑफलाइन क्लास और क्लिनिकल ट्रेनिंग करनी होगी। अलीगढ़ के Jawaharlal Nehru Medical College के अधिकारियों ने भी नए आदेश का हवाला देते हुए कहा है कि ऑनलाइन पढ़ाई की भरपाई बिना शैक्षणिक अवधि बढ़ाए संभव नहीं है।
दरअसल, कोरोना महामारी के दौरान कई विदेशी मेडिकल विश्वविद्यालयों ने ऑनलाइन कक्षाएं शुरू कर दी थीं। बड़ी संख्या में भारतीय छात्र भी इन्हीं माध्यमों से पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन मेडिकल शिक्षा में मरीजों के साथ काम करने का अनुभव, अस्पतालों में प्रशिक्षण और व्यावहारिक ज्ञान बेहद जरूरी माना जाता है। यही कारण है कि एनएमसी ने इस विषय पर सख्त रुख अपनाया है।
उत्तर प्रदेश के छात्रों की बात करें तो विदेश जाकर एमबीबीएस करने वालों की संख्या यहां काफी अधिक है। विशेषज्ञों के अनुसार प्रदेश से हर साल बड़ी संख्या में छात्र रूस, यूक्रेन, कजाखस्तान, फिलीपींस और अन्य देशों के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला लेते हैं।
उत्तर प्रदेश विदेशी मेडिकल स्नातकों के लिए भारत में सबसे अधिक सीआरएमआई (Compulsory Rotating Medical Internship) सीटें उपलब्ध कराने वाला राज्य भी है। यहां करीब 4,490 सीटें विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स के लिए उपलब्ध हैं। वहीं प्रदेश में कुल मिलाकर लगभग 9,000 से अधिक एमबीबीएस सीटें भी मौजूद हैं।
हालांकि विदेश से मेडिकल डिग्री लेने के बाद भारत में डॉक्टर के तौर पर प्रैक्टिस करने के लिए कुछ जरूरी शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। सबसे पहले छात्रों को Foreign Medical Graduate Examination (FMGE) या स्क्रीनिंग टेस्ट पास करना होता है। यह परीक्षा National Board of Examinations in Medical Sciences (NBEMS) आयोजित करता है।
इस परीक्षा को पास करने के बाद ही छात्रों को भारत में एक साल की अनिवार्य रोटेटरी इंटर्नशिप करनी होती है। इसके बाद ही उन्हें भारत में मेडिकल प्रैक्टिस की अनुमति मिलती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि एनएमसी का यह फैसला मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए जरूरी है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि विदेश से पढ़कर आने वाले डॉक्टरों को भी पर्याप्त क्लिनिकल अनुभव और व्यावहारिक प्रशिक्षण मिला हो।




Add comment