
देश के सर्वोच्च न्यायालय Supreme Court of India में कई बार ऐसी याचिकाएं भी पहुंच जाती हैं जिन पर अदालत को कड़ी टिप्पणी करनी पड़ती है। हाल ही में एक ऐसी ही याचिका की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने याचिकाकर्ता से तीखे सवाल किए और अदालत में ही अंग्रेजी की परीक्षा लेने तक की बात कह दी।
सुनवाई के दौरान अदालत का माहौल कुछ देर के लिए असामान्य हो गया, जब मुख्य न्यायाधीश ने याचिका की भाषा और उसमें इस्तेमाल किए गए जटिल कानूनी शब्दों को लेकर याचिकाकर्ता से सवाल पूछे। उन्होंने सबसे पहले यह जानना चाहा कि क्या याचिका का मसौदा खुद याचिकाकर्ता ने तैयार किया है। इस पर याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि उसने ही इसे लिखा है और जरूरत पड़े तो वह अपना फोन भी अदालत में जमा कर सकता है।
इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता की शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बारे में पूछा। याचिकाकर्ता ने बताया कि वह 12वीं पास है और लुधियाना के सनातन धर्म स्कूल से पढ़ाई की है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यदि याचिका वास्तव में उसी ने तैयार की है तो वह अदालत में ही एक अंग्रेजी परीक्षा आयोजित कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि उसमें 30 अंक भी आ जाते हैं, तभी इस याचिका पर आगे विचार किया जाएगा
सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका में इस्तेमाल किए गए कुछ कानूनी शब्दों, जैसे “फिड्यूशियरी रिस्क” और कॉर्पोरेट डोनर्स से जुड़े संदर्भों के बारे में भी स्पष्टीकरण मांगा। जब याचिकाकर्ता इन शब्दों का स्पष्ट अर्थ नहीं बता पाया, तो अदालत ने पूछा कि आखिर यह मसौदा किसने तैयार किया है।
मामले में मौजूद अधिवक्ता ने बताया कि उन्होंने ऑनलाइन एआई टूल्स के जरिए जानकारी खोजी थी और टाइपिंग के लिए एक टाइपिस्ट की मदद ली थी, जिसने टाइपिंग के लिए प्रति घंटे शुल्क लिया था। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता ने किसी अन्य व्यक्ति को अपना नाम इस्तेमाल करने दिया है, जिसने एक अस्पष्ट और बेतुकी याचिका तैयार कर दी है।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि याचिका में जिन संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है, वह उस व्यक्ति की सोच नहीं लगती जो एक छोटा व्यापारी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में हमेशा जांच का आदेश नहीं दिया जाता, लेकिन भविष्य में इस तरह की निरर्थक याचिकाएं दाखिल करने से बचना चाहिए।
सुनवाई के अंत में मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता को सख्त चेतावनी देते हुए कहा कि अदालत का समय अनावश्यक मामलों में बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर इस तरह की याचिकाएं आगे भी दाखिल की जाती हैं तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। अदालत की इस टिप्पणी को न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने की सख्त चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।




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