
भारत लंबे समय से दुनिया के उन देशों में रहा है जहां से बड़ी संख्या में छात्र विदेश पढ़ाई के लिए जाते हैं। लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक भारत न सिर्फ विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए छात्रों का बड़ा स्रोत बना हुआ है, बल्कि एशिया में तेजी से उभरता हुआ स्टडी डेस्टिनेशन भी बन रहा है।
इस महीने जारी हुई रिपोर्ट “QS Global Student Flows: India 2026” के अनुसार आने वाले वर्षों में भारत में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या लगातार बढ़ने की संभावना है। रिपोर्ट बताती है कि जहां एक ओर भारतीय छात्रों का विदेश जाकर पढ़ने का रुझान जारी है, वहीं दूसरी ओर भारत में पढ़ने आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या भी धीरे-धीरे बढ़ रही है।
Ashwin Fernandes, जो Quacquarelli Symonds इंडिया के चेयर और रणनीतिक एवं अंतरराष्ट्रीय सहभागिता के उपाध्यक्ष हैं, का कहना है कि भारत लंबे समय से वैश्विक छात्र गतिशीलता का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। उनके अनुसार भारत न केवल अंतरराष्ट्रीय छात्रों का बड़ा स्रोत है, बल्कि भविष्य में वैश्विक शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने वाला अहम देश भी बन सकता है।
भारत में बढ़ सकते हैं विदेशी छात्र
रिपोर्ट के मुताबिक इस दशक के अंत तक भारत में पढ़ने आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या हर साल करीब 8 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। फिलहाल देश में लगभग 58 हजार अंतरराष्ट्रीय छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। शिक्षा ढांचे को आधुनिक बनाने और एडमिशन प्रक्रिया को सरल करने के प्रयासों का असर अब दिखाई देने लगा है।
इस बदलाव में National Education Policy 2020 की महत्वपूर्ण भूमिका बताई गई है। इस नीति के तहत विश्वविद्यालयों को यह अनुमति दी गई है कि वे अपनी कुल सीटों का 25 प्रतिशत तक हिस्सा विदेशी छात्रों के लिए आरक्षित कर सकते हैं, बिना घरेलू छात्रों की सीटें घटाए।
Rahul Choudaha, जो University of Aberdeen, Mumbai में प्रोफेसर और मुख्य परिचालन अधिकारी हैं, का कहना है कि नई शिक्षा नीति वैश्विक जुड़ाव के नए रास्ते खोल रही है। उनके अनुसार भारत को केवल प्रतिभा भेजने वाला देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से प्रतिभा आकर्षित करने वाला केंद्र भी बनना चाहिए।
दक्षिण एशिया से सबसे ज्यादा छात्र
सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2047 तक भारत में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या पांच लाख तक पहुंचाई जाए। फिलहाल सबसे अधिक छात्र दक्षिण एशिया के देशों से आते हैं। रिपोर्ट के अनुसार Nepal और Bangladesh से आने वाले छात्र कुल विदेशी छात्रों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा हैं।
इसके साथ ही अब एक नया रुझान अफ्रीका और मध्य-पूर्व के देशों से भी दिखाई देने लगा है। उप-सहारा अफ्रीका के देशों में युवा आबादी तेजी से बढ़ रही है और पश्चिमी देशों में पढ़ाई का खर्च काफी अधिक है। ऐसे में Zimbabwe जैसे देशों के छात्र भारत की अपेक्षाकृत कम लागत और मजबूत शैक्षणिक प्रणाली के कारण यहां पढ़ाई में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस खुलने से भी पड़ोसी देशों के छात्रों के लिए यहां पढ़ाई करना आकर्षक विकल्प बन सकता है। खासकर ऐसे समय में जब मध्य-पूर्व जैसे क्षेत्रों में भू-राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ रही है।
वैश्विक शिक्षा केंद्र बनने की राह में चुनौतियां
हालांकि रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत को वैश्विक शिक्षा केंद्र बनने के रास्ते में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। सबसे बड़ी चुनौती संस्थानों की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़ी है। भारतीय छात्रों को वैश्विक कंपनियां काफी पसंद करती हैं, लेकिन कई विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक पहचान अभी भी पश्चिमी देशों के प्रतिष्ठित संस्थानों से पीछे मानी जाती है।
इसके अलावा शिक्षा की गुणवत्ता और रोजगार क्षमता भी एक अहम मुद्दा है। हाल के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय स्नातकों में से आधे से भी कम को आधुनिक उद्योग मानकों के अनुसार पूरी तरह रोजगार योग्य माना जाता है। विदेशी छात्र केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि इंटर्नशिप, कार्य अनुभव और स्थिर करियर के अवसर भी चाहते हैं।
विदेश पढ़ने का सपना अभी भी मजबूत
रिपोर्ट के अनुसार 2024 तक लगभग 8 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ाई कर रहे थे। इससे साफ है कि विदेशी डिग्री अभी भी भारतीय मध्यम वर्ग के लिए एक बड़ा सपना बनी हुई है।
हालांकि विदेश में पढ़ाई के लिए पारंपरिक पसंदीदा देशों—Canada, United Kingdom, United States और Australia—ने हाल के वर्षों में छात्र वीज़ा नियमों को सख्त किया है। इससे कई छात्रों के लिए अनिश्चितता बढ़ी है।
उदाहरण के तौर पर Australia ने वीज़ा प्रोसेसिंग में भारत को हाई-रिस्क श्रेणी में रखा, जिससे छात्रों को दस्तावेज़ और प्रक्रिया को लेकर अधिक सावधानी बरतनी पड़ रही है।
नए देशों की ओर बढ़ रहे भारतीय छात्र
इन बदलावों के कारण अब भारतीय छात्र केवल अंग्रेजी बोलने वाले चार बड़े देशों तक सीमित नहीं रह गए हैं। कई छात्र अब Germany, France, Ireland और Singapore जैसे देशों की ओर भी रुख कर रहे हैं। इन देशों में कम फीस, पढ़ाई के बाद काम करने के अवसर और अपेक्षाकृत स्थिर राजनीतिक माहौल जैसे फायदे मिलते हैं।
नई शिक्षा नीति ने भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने कैंपस खोलने का रास्ता भी साफ किया है। खासकर GIFT City जैसे शैक्षणिक और वित्तीय हब में अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के आने की संभावना बढ़ रही है।
इससे छात्रों और उनके परिवारों को विदेश डिग्री का अनुभव भारत में ही अपेक्षाकृत कम खर्च पर मिल सकता है। साथ ही विदेश में रहने-खाने की ऊंची लागत और मुद्रा विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से जुड़े जोखिम भी कम हो सकते हैं।




Add comment