
भारत में चावल सिर्फ करोड़ों लोगों का भोजन नहीं है, बल्कि यह आदत, संस्कृति और जीवनयापन का आधार है। लेकिन देश का यह प्रमुख आहार लंबे समय से पोषण के मामले में एक विरोधाभास रहा है—कैलोरी ज्यादा, पर प्रोटीन बेहद कम। यही वजह है कि चावल आधारित खानपान को मधुमेह और कुपोषण से भी जोड़ा जाता है। अब इस चुनौती का समाधान वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है।
CSIR-National Institute for Interdisciplinary Science and Technology के वैज्ञानिकों की एक टीम ने चावल के दाने को पुनः संरचित कर एक बड़ी सफलता हासिल की है। फूड टेक्नोलॉजिस्ट्स के नेतृत्व में विकसित इस नए चावल को “डिज़ाइनर राइस” कहा जा रहा है।
इस खास चावल में 20% से अधिक प्रोटीन है, जो सामान्य पॉलिश्ड चावल की तुलना में लगभग तीन गुना ज्यादा है। इससे भी अहम बात यह है कि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स 55 से कम है, यानी यह तेजी से ब्लड शुगर नहीं बढ़ाता। भारत में मधुमेह के मरीजों की संख्या 10 करोड़ से अधिक आंकी जाती है, ऐसे में यह चावल उनके लिए बेहतर विकल्प बन सकता है।
यह नवाचार सिर्फ प्रोटीन और शुगर नियंत्रण तक सीमित नहीं है। माइक्रोएनकैप्सुलेशन तकनीक की मदद से वैज्ञानिकों ने आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 जैसे जरूरी पोषक तत्वों को चावल के दानों के भीतर सूक्ष्म सुरक्षात्मक परतों में सुरक्षित किया है। इन सूक्ष्म आवरणों की वजह से पोषक तत्व धुलाई या प्रेशर कुकिंग के दौरान नष्ट नहीं होते, जबकि सामान्य फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों में यही सबसे बड़ी समस्या होती है।
इस तकनीक की प्रक्रिया सरल लेकिन बेहद प्रभावी है। टूटे हुए चावल, जिन्हें आमतौर पर बेकार माना जाता है, उन्हें आटे में बदला जाता है। फिर आटे में मौजूद स्टार्च की मात्रा संतुलित की जाती है और एक्सट्रूज़न तकनीक से इसे दोबारा चावल जैसे दानों का रूप दिया जाता है। ये दाने दिखने, स्वाद और बनावट में सामान्य चावल जैसे ही होते हैं।
सबसे खास बात यह है कि उपभोक्ताओं को अपनी खानपान की आदतों में कोई बदलाव नहीं करना पड़ेगा, लेकिन उन्हें बेहतर पोषण मिलेगा।
महत्वपूर्ण रूप से, यह जेनेटिक मॉडिफिकेशन नहीं है। यानी यह तकनीक उन नियमों और जन-आपत्तियों से बचती है जो आमतौर पर जीएम फसलों के साथ जुड़ी होती हैं। यह बायोटेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि फूड टेक्नोलॉजी आधारित नवाचार है।
इस तकनीक को उद्योग क्षेत्र तक पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। योजना है कि वर्ष 2027 तक इसे भारत की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में शामिल किया जाए। यदि बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन सफल रहता है, तो डिज़ाइनर चावल “छिपी भूख” से लड़ने में अहम भूमिका निभा सकता है—ऐसी स्थिति जब लोग पर्याप्त कैलोरी तो लेते हैं, लेकिन जरूरी पोषक तत्वों की कमी बनी रहती है।
कुल मिलाकर, भारत ने अपने प्रमुख खाद्यान्न में मूल्यवर्धन का नया तरीका खोज लिया है, वह भी बिना लोगों की खाने की आदतें बदले।




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