
- R. Gavai ने न्यायिक नियुक्तियों को लेकर चल रही बहस के बीच एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। बेंगलुरु में आयोजित सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने कहा कि भले ही कॉलेजियम सिस्टम पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं है, लेकिन मौजूदा हालात में न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए यही प्रणाली सबसे प्रभावी है।
अपने संबोधन में उन्होंने साफ कहा कि दुनिया में कोई भी सिस्टम परफेक्ट नहीं हो सकता। हर व्यवस्था के अपने फायदे और सीमाएं होती हैं, लेकिन भारत में कॉलेजियम सिस्टम कई दशकों के अनुभव और परीक्षण के बाद एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरा है।
पूर्व CJI ने यह भी समझाया कि कॉलेजियम की प्रक्रिया को मनमाना कहना सही नहीं है। उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम जज किसी उम्मीदवार के नाम की अनुशंसा करते हैं, जिसके बाद केंद्र सरकार, इंटेलिजेंस ब्यूरो और अन्य एजेंसियां अपनी रिपोर्ट देती हैं। सरकार के आपत्तियों पर कॉलेजियम गंभीरता से विचार करता है और अंतिम निर्णय सभी तथ्यों के आधार पर लिया जाता है।
उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा नियुक्तियों में हो रही देरी को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि कॉलेजियम किसी नाम को दोबारा भेजता है, तो सरकार नियुक्ति करने के लिए बाध्य है। बावजूद इसके कई नामों पर अभी तक मंजूरी नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी पर आरोप नहीं लगाना, लेकिन इस देरी से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है और इसे गंभीरता से देखने की जरूरत है।
देश में बढ़ते ‘बुलडोजर एक्शन’ पर भी उन्होंने सख्त टिप्पणी की। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सिर्फ शक के आधार पर किसी आरोपी के घर पर बुलडोजर चलाना कानूनसम्मत है? क्या कार्यपालिका को अपनी शक्ति का दुरुपयोग करने की अनुमति दी जा सकती है? उनके अनुसार ‘विकसित भारत’ का लक्ष्य कानून और न्याय व्यवस्था को मजबूत किए बिना पूरा नहीं हो सकता।
उन्होंने अदालतों में बढ़ते मुकदमों के बोझ पर भी बात की और इस समस्या के लिए केवल न्यायपालिका को जिम्मेदार ठहराना गलत बताया। उन्होंने कहा कि कई बार आरोपी अपनी सजा का अधिकांश समय जेल में काट देने के बाद जमानत पाता है, लेकिन सरकार अक्सर इन आदेशों को चुनौती देकर अनावश्यक पेंडेंसी बढ़ाती है। उन्होंने सरकार से ‘नेशनल लिटिगेशन पॉलिसी’ को जल्द लागू करने की अपील की, ताकि अनावश्यक मुकदमों पर रोक लग सके और अदालतों का बोझ कम हो।
पूर्व CJI के इन बयानो ने एक बार फिर न्यायिक नियुक्तियों, कार्यपालिका की भूमिका और न्यायिक सुधारों पर नई चर्चा छेड़ दी है।




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